UP Forest Corporation scam :बैंक में 65 करोड़ का फ्रॉड और ऑफिस में ‘मलाईदार’ पोस्टिंग, UP वन निगम में ये क्या हो रहा है?
Bank of India fraud :कभी-कभी सरकारी विभागों की कहानियां किसी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी लगती हैं। ऐसी ही एक कहानी उत्तर प्रदेश के वन निगम की है, जहाँ एक तरफ लगभग 65 करोड़ रुपये के बैंक घोटाले की जांच चल रही है, तो दूसरी तरफ ऑफिस के अंदर ही भ्रष्टाचार और ‘सेटिंग’ के आरोप लग रहे हैं।
पहले समझिए, 65 करोड़ का फ्रॉड कैसे बचा?
कहानी शुरू होती है बैंक ऑफ इंडिया से। किसी ने 'एमडी वन निगम' के नाम से एक फर्जी बैंक खाता खोला। प्लान यह था कि निगम के 64 करोड़ 82 लाख रुपये की FD बनवाकर इस फर्जी खाते से पैसा उड़ा लिया जाए।
साजिश करने वाले कामयाब हो भी जाते, लेकिन तभी एक नए वित्त अधिकारी की नज़र इस पर पड़ गई और उन्होंने तुरंत सबको अलर्ट कर दिया। हालांकि, चोरों ने तब तक करीब 7 करोड़ रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिए थे। पर इससे पहले कि वे पैसा निकाल पाते, बैंक ने ज़्यादातर खातों को ब्लॉक कर दिया। अब भी करीब 1 से 1.5 करोड़ रुपये की रिकवरी के लिए बैंक और जांच एजेंसियां दिन-रात एक किए हुए हैं।
बैंक इस बात की भी जांच कर रहा है कि इस खेल में कोई बैंक का कर्मचारी तो शामिल नहीं था। मामला अब बड़ी जांच एजेंसियों के पास है।
एक घोटाला खत्म नहीं, दूसरा शुरू: ऑफिस के अंदर का खेल
एक तरफ तो ये बैंक घोटाले की आग लगी हुई है, और दूसरी तरफ, वन निगम के अंदर ही भ्रष्टाचार की एक अलग कहानी चल रही है। कहा जा रहा है कि जब से एमडी अरविंद कुमार सिंह आए हैं, निगम में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जो कर्मचारी यूनियन पहले ऐसी बातों पर खूब आवाज़ उठाती थी, अब वह पूरी तरह से चुप है। आरोप है कि एमडी साहब ने यूनियन के कुछ बड़े नेताओं को खुश करने के लिए उन्हें ऐसी ‘मलाईदार’ कुर्सियों पर बिठा दिया है, जिसके वे हकदार भी नहीं हैं, ताकि कोई उनके खिलाफ मुँह न खोल सके।
कौन हैं वो लोग जिन्हें मिली ‘मलाईदार’ पोस्टिंग?
- गौरव अमोली: ये यूनियन के अध्यक्ष हैं। हैं तो असल में एक क्लर्क (असिस्टेंट ग्रेड-2), लेकिन उन्हें मार्केटिंग अफसर बना दिया गया है। इतना ही नहीं, वो पूरे प्रदेश में संविदा पर रखे गए कर्मचारियों की पोस्टिंग का काम भी देखते हैं। आरोप है कि वे पोस्टिंग के नाम पर मनमानी करते हैं और वसूली भी की जाती है।
- दिलीप कुमार शुक्ला: ये मार्केटिंग शाखा में तैनात हैं और पूरे प्रदेश में जंगल के उत्पादों (जैसे पेड़, तेंदूपत्ता) की नीलामी का काम देखते हैं। कहा जा रहा है कि अगर पेड़ों और तेंदूपत्ते की नीलामी की ठीक से जांच हो जाए तो सैकड़ों करोड़ का घोटाला सामने आ सकता है।
- अनूप कुमार मिश्रा: ये भी एक क्लर्क हैं और यूनियन में मंत्री हैं। इन्हें मुख्यालय की कॉलोनी की देखरेख (मेंटेनेंस) का काम दिया गया है। यहां भी मेंटेनेंस के नाम पर खूब धांधली होने के आरोप लग रहे हैं।
- काशेन्द्र सिंह: ये भी क्लर्क हैं, लेकिन इनकी तैनाती सीधे एमडी के कैंप ऑफिस में है। सूत्रों का कहना है कि ये एमडी के सबसे करीबी हैं और उनके सारे पर्सनल काम और कथित 'डीलिंग' का हिसाब-किताब यही देखते हैं।
जब एमडी अरविंद कुमार सिंह से इन सब पर सवाल किया जाता है, तो वो चुप हो जाते हैं। एक तरफ बैंक घोटाले के तार खोजे जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ विभाग के अंदर चल रही ये 'सेटिंग' कई बड़े सवाल खड़े करती है।