Tulsi Vivah 2025: आखिर क्यों जगत के पालनहार भगवान विष्णु को बनना पड़ा पत्थर? पढ़ें वृंदा के श्राप की पूरी कथा

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News India Live, Digital Desk : Tulsi Vivah 2025: हर साल कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन बेहद खास होता है। इसे 'देवउठनी एकादशी' कहा जाता है, यानी वो दिन जब भगवान विष्णु चार महीने की अपनी लंबी नींद से जागते हैं। इसी पावन दिन पर 'तुलसी विवाह' की खूबसूरत परंपरा भी निभाई जाती है, जिसमें घर-घर में तुलसी जी का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप (एक विशेष पत्थर) के साथ किया जाता है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन्हें हम सृष्टि का रक्षक मानते हैं, उन भगवान विष्णु को पत्थर का रूप क्यों लेना पड़ा? इसके पीछे एक ऐसी पौराणिक कथा है जिसमें प्रेम, पतिव्रता धर्म, छल और एक स्त्री के श्राप की शक्ति का अद्भुत वर्णन है।

कौन थीं वृंदा, जिनके सतीत्व से कांपते थे देवता?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जालंधर नाम का एक बहुत शक्तिशाली असुर था, जिसे कोई हरा नहीं सकता था। उसकी इस शक्ति का राज था उसकी पत्नी 'वृंदा'। वृंदा एक परम पतिव्रता नारी थी और भगवान विष्णु की अनन्य भक्त भी थी। उसके पतिव्रता धर्म की शक्ति इतनी ज्यादा थी कि इसने जालंधर के लिए एक सुरक्षा कवच बना दिया था, जिसे कोई भी देवता भेद नहीं सकता था।

जालंधर अपनी ताकत के नशे में चूर होकर तीनों लोकों में अत्याचार करने लगा। उसने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर भी कब्जा कर लिया। जब सभी देवता हार गए, तो वे मदद के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे।

जब वृंदा का पतिव्रता धर्म तोड़ने के लिए विष्णु ने किया छल

भगवान विष्णु जानते थे कि जब तक वृंदा का पतिव्रता धर्म बना हुआ है, जालंधर को मारना असंभव है। इसलिए, देवताओं की रक्षा के लिए उन्होंने एक योजना बनाई। जब जालंधर देवताओं के साथ युद्ध कर रहा था, तब भगवान विष्णु ने जालंधर का ही रूप धारण किया और सीधे वृंदा के महल पहुंच गए।

वृंदा ने अपने पति को सामने देखा तो वह कुछ समझ नहीं पाईं और उन्हें अपना पति मानकर उनके साथ पत्नी धर्म का आचरण किया। जैसे ही वृंदा का पतिव्रत धर्म टूटा, दूसरी तरफ युद्ध के मैदान में देवताओं ने जालंधर को मार गिराया। जब जालंधर का कटा हुआ सिर वृंदा के महल में आकर गिरा, तब उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि उनके साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है।

वृंदा का वह श्राप, जिससे पत्थर बन गए भगवान विष्णु

जब वृंदा ने अपने सामने भगवान विष्णु को अपने पति के वेश में देखा, तो उनका दिल टूट गया और वह क्रोध से भर गईं। उन्होंने रोते हुए कहा, "हे नारायण! आप तो जगत के पालक हैं, आपने मेरे साथ ऐसा छल क्यों किया? मेरे पति को मारने के लिए आपने मेरे सतीत्व को भंग कर दिया। आपने पत्थर की तरह कठोर हृदय रखकर यह कार्य किया है, इसलिए मैं आपको श्राप देती हूं कि आप भी पत्थर के हो जाएंगे।"

एक पतिव्रता स्त्री के मुख से निकले इस श्राप का प्रभाव इतना तेज था कि भगवान विष्णु उसी क्षण पत्थर के रूप में बदल गए। इसी पत्थर के स्वरूप को 'शालिग्राम' कहा जाता है।

कैसे मिला श्राप से मुक्ति और तुलसी विवाह का वरदान?

भगवान विष्णु के पत्थर बन जाने से पूरी सृष्टि में असंतुलन पैदा हो गया। सभी देवता और माता लक्ष्मी ने वृंदा से अपना श्राप वापस लेने की प्रार्थना की। वृंदा ने अपना श्राप तो वापस ले लिया, लेकिन भगवान विष्णु ने उनके पतिव्रत धर्म का सम्मान करते हुए कहा कि उनका यह शालिग्राम स्वरूप हमेशा पूजा जाएगा।

इसके बाद वृंदा अपने पति जालंधर के शव के साथ सती हो गईं। जिस स्थान पर उनकी चिता जली, उस राख से एक पौधा उगा। भगवान विष्णु ने उस पौधे को 'तुलसी' नाम दिया और यह वरदान दिया कि, "वृंदा, तुम तुलसी के रूप में सदैव मेरे साथ रहोगी। तुम्हारा विवाह मेरे शालिग्राम स्वरूप से होगा और तुम्हारे बिना मेरी कोई भी पूजा अधूरी मानी जाएगी।"

बस तभी से हर साल देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराने की परंपरा शुरू हुई, जो एक भक्त और भगवान के अटूट रिश्ते की कहानी कहती है।