ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का पुराना प्रेम और नई चेतावनी आखिर इसके पीछे की असली वजह क्या है?

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News India Live, Digital Desk: जब बात डोनाल्ड ट्रंप की हो, तो उनके पास चर्चा में रहने के कई ऐसे आइडिया होते हैं जो पूरी दुनिया को हैरान कर देते हैं। एक बार फिर ऐसा ही कुछ हुआ है। काफी समय से खामोश चल रहे 'ग्रीनलैंड को खरीदने या वहां कुछ बड़ा करने' के मुद्दे को ट्रंप ने फिर से हवा दे दी है। उन्होंने साफ़ लहजे में कह दिया है कि "ग्रीनलैंड पर हम कुछ ज़रूर करेंगे, भले ही वे लोग इसे पसंद करें या नहीं।"

बात सिर्फ ज़मीन की नहीं है
सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है कि एक राष्ट्रपति किसी दूसरे देश (डेनमार्क) के स्वायत्त हिस्से के बारे में ऐसा बोल रहा है। लेकिन अगर आप ट्रंप की कार्यशैली को देखें, तो उनके लिए यह महज़ कोई ज़मीन का टुकड़ा नहीं है। दरअसल, ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और वह बर्फ़ की चादर के नीचे छिपे बेशकीमती संसाधनों का भंडार है। चाहे वह खनिज पदार्थ हों या फिर रणनीतिक सैन्य ठिकाना बनाने की जगह, अमेरिका इसे बहुत लंबे समय से अपनी पहुंच में चाहता है।

इतिहास और वो विवादित कोशिश
आपको याद होगा कि ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में भी ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा जताई थी। तब डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने इसे 'बेतुकी' बात कहकर टाल दिया था। लेकिन अब 2026 में एक बार फिर ट्रंप के सुर वही हैं। उनका कहना है कि वे कुछ न कुछ ऐसा करेंगे जो अमेरिका के हित में होगा। इसमें आर्थिक साझेदारी से लेकर वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाने तक के कई अर्थ छिपे हो सकते हैं।

क्या ग्रीनलैंड को वाकई चिंता करनी चाहिए?
ग्रीनलैंड के लोगों के लिए अपनी स्वायत्तता और अपनी ज़मीन सबसे ऊपर है। जब भी इस तरह की "ज़बरदस्ती" वाली बातें सामने आती हैं, तो वहां विरोध की लहर भी तेज होती है। सवाल यह उठता है कि क्या वाकई अमेरिका बिना सहमति के वहां कुछ कर पाएगा? कूटनीतिक जानकार इसे सिर्फ 'बार्गेनिंग' या दबाव बनाने की तकनीक मान रहे हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी दूसरे देश की मर्ज़ी के खिलाफ उसकी सीमाओं में कुछ भी करना नामुमकिन जैसा है।