बद्रीनाथ धाम को क्यों कहते हैं भू-वैकुंठ? जानिए रहस्य

बद्रीनाथ धाम को क्यों कहते हैं भू-वैकुंठ? जानिए रहस्य

 

पौराणिक मान्यताओं और सनातन हिंदू शास्त्रों के अनुसार, वैकुंठ लोक भगवान श्री हरि विष्णु का परम धाम माना गया है, जहां वे माता लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं। लेकिन धरती लोक पर स्थित बद्रीनाथ धाम को 'भू-वैकुंठ' की संज्ञा दी गई है क्योंकि माना जाता है कि सत्ययुग में भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु अलकनंदा नदी के तट पर स्थित इस शांत और हिममंडित क्षेत्र में घोर तपस्या में लीन थे, तब उन पर भीषण बर्फबारी और तूफानी हवाओं का प्रकोप होने लगा। भगवान विष्णु को इस विकट मौसम से बचाने के लिए माता लक्ष्मी ने स्वयं एक विशाल 'बद्री' यानी जंगली बेर के वृक्ष का रूप धारण कर लिया और बर्फ, हवा व धूप को अपने ऊपर सहते हुए भगवान विष्णु को छत्रछाया प्रदान की। जब भगवान विष्णु की तपस्या पूर्ण हुई और उन्होंने देखा कि माता लक्ष्मी बर्फ से ढकी हुई हैं, तब उन्होंने प्रसन्न होकर कहा कि आज से इस स्थान पर उन्हें 'बद्री के नाथ' यानी 'बद्रीनाथ' के नाम से जाना जाएगा और यह स्थान भू-वैकुंठ कहलाएगा।

कपाट बंद होने के बाद 6 महीने कहां जाते हैं भगवान बद्री विशाल?

उत्तराखंड के उच्च हिमाच्छादित क्षेत्रों में स्थित होने के कारण सर्दियों के दौरान बद्रीनाथ धाम में अत्यधिक बर्फबारी होती है, जिससे पूरा क्षेत्र माइनस तापमान और बर्फ की मोटी चादर से ढक जाता है। इसी कारण हर वर्ष कार्तिक मास की ठंड में (अक्टूबर-नवंबर के आसपास) विशेष वैदिक अनुष्ठानों के साथ मंदिर के कपाट अगले 6 महीनों के लिए श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिए जाते हैं। कपाट बंद होने से पूर्व एक अनूठी और अत्यंत पवित्र परंपरा निभाई जाती है। भगवान बद्रीनाथ की चल-विग्रह मूर्ति (उत्सव मूर्ति) को पूरे आदर और मंत्रोच्चार के साथ मंदिर से नीचे जोशीमठ (Narsingh Temple, Joshimath) लाया जाता है। शीतकाल के पूरे 6 महीनों के दौरान भगवान बद्री विशाल जोशीमठ के प्रसिद्ध श्री नृसिंह मंदिर में विराजमान रहते हैं, और वहीं पर नित्य नियम से उनकी पूजा-अर्चना और भोग का कार्य संपन्न किया जाता है।

शीतकाल में 6 महीने तक कौन करता है भगवान की मुख्य पूजा?

बद्रीनाथ धाम के संबंध में सबसे चमत्कारिक और रहस्यमयी मान्यता यह है कि जब मंदिर के मुख्य कपाट मनुष्यों के लिए बंद हो जाते हैं, तब भी वहां पूजा रुकती नहीं है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सर्दियों के 6 महीनों के दौरान धाम में इंसान मौजूद नहीं होते, तब स्वयं देवर्षि नारद और अन्य देवी-देवता वहां आकर भगवान बद्री विशाल की पूजा करते हैं। कपाट बंद करते समय मुख्य पुजारी (रावल जी) मंदिर के अंदर एक अखंड दीपक (अखंड ज्योति) प्रज्वलित करके जाते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि 6 महीने बाद जब वैशाख मास (अप्रैल-मई) में कपाट दोबारा खोले जाते हैं, तो वह अखंड ज्योति वैसी ही जलती हुई मिलती है और भगवान पर चढ़ाई गई तुलसी की पत्तियां वैसी ही ताजा पाई जाती हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए कपाट खुलने के दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु बद्रीनाथ पहुंचते हैं।

नर-नारायण पर्वत और बद्रीनाथ धाम का अद्वितीय धार्मिक महत्व

बद्रीनाथ धाम केवल एक मंदिर ही नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक ज्ञान, योग और शांति का महान केंद्र है। यह दिव्य धाम 'नर' और 'नारायण' नामक दो विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित है। पौराणिक ग्रंथों में नर और नारायण को भगवान विष्णु के ही दो अंश या अवतार माना गया है, जिन्होंने लोक कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए यहां तपस्या की थी। माना जाता है कि द्वापर युग में यही 'नर' अर्जुन के रूप में और 'नारायण' भगवान श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे। इसके अलावा, बद्रीनाथ मंदिर परिसर के पास स्थित 'तप्त कुंड' (गर्म पानी का प्राकृतिक स्रोत) भी अपने आप में एक बड़ा वैज्ञानिक और धार्मिक चमत्कार है, जहां कड़ाके की ठंड में भी उबलता हुआ गर्म पानी निकलता है। श्रद्धालु इसमें स्नान करके अपने पापों का नाश करते हैं और खुद को पावन महसूस करते हैं।