भारत की ये 5 खास जगहें जहां अलग ही अंदाज में मनता है विजयादशमी का पर्व

भारत की ये 5 खास जगहें जहां अलग ही अंदाज में मनता है विजयादशमी का पर्व

भारत विविधताओं और सांस्कृतिक धरोहरों का देश है, जहां एक ही त्योहार को मनाने के कई रंग और अनूठे अंदाज देखने को मिलते हैं। विजयादशमी यानी दशहरा भी एक ऐसा ही पावन पर्व है, जिसे पूरे देश में अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय के रूप में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। सामान्यतः अधिकांश हिस्सों में इस दिन भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध की स्मृति में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं और विशाल रामलीलाओं का आयोजन होता है। हालांकि, भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर कुछ ऐसे अनोखे स्थान भी हैं जहां दशहरे का स्वरूप और परंपराएं सामान्य तरीकों से बिल्कुल अलग हैं। कहीं 75 दिनों तक चलने वाला आदिवासियों का भव्य महाउत्सव आयोजित होता है, तो कहीं भगवान शिव की नगरी में रावण का पुतला जलाना पूरी तरह वर्जित है। यदि आप भी इस विजयादशमी पर भारत के अलग-अलग कोनों की अनूठी मान्यताओं और परंपराओं को गहराई से समझना चाहते हैं, तो आइए जानते हैं देश की उन 5 खास जगहों के बारे में जहां दशहरा मनाने का अंदाज सबसे खास और मनमोहक है।

हिमाचल का कुल्लू दशहरा: जहां रावण दहन की जगह बैठती है देव संसद और जुटते हैं सैकड़ों देवी-देवता

हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में बसा कुल्लू शहर अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक 'कुल्लू दशहरा' के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है। देश के बाकी हिस्सों में जहां विजयादशमी के दिन रावण दहन के साथ उत्सव का समापन हो जाता है, वहीं कुल्लू में इसी दिन से सात दिवसीय विशाल देव उत्सव का शुभारंभ होता है। कुल्लू के ढालपुर मैदान में मनाए जाने वाले इस उत्सव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां रावण, कुंभकरण या मेघनाद का कोई पुतला नहीं जलाया जाता। इसके बजाय, कुल्लू घाटी के लगभग 200 से अधिक स्थानीय देवी-देवता अपने सुसज्जित रथों में विराजमान होकर भगवान रघुनाथ जी (श्रीराम) को शीश नवाने पहुंचते हैं। इस दौरान भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसे देखने देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। सातवें दिन लंका दहन के प्रतीकात्मक अनुष्ठान के रूप में व्यास नदी के किनारे घास-फूस को जलाकर और पशु बलि के प्रतीकात्मक विधान के साथ इस अनूठे उत्सव का समापन किया जाता है।

छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा: 75 दिनों तक चलने वाला दुनिया का सबसे लंबा लोक उत्सव

अगर बात सबसे लंबे और अनोखे दशहरे की हो, तो छत्तीसगढ़ के जगदलपुर और बस्तर अंचल का नाम सबसे ऊपर आता है। बस्तर का दशहरा भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपनी तरह का सबसे लंबा चलने वाला लोक उत्सव है, जो करीब 75 दिनों तक निरंतर चलता है। इस उत्सव का इतिहास लगभग 600 साल से भी अधिक पुराना है, जिसे काकतीय राजवंश के राजाओं द्वारा शुरू किया गया था। बस्तर दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह उत्सव भगवान राम की विजय कथा से न जुड़कर स्थानीय अधिष्ठात्री देवी 'मां दंतेश्वरी' की पूजा-अर्चना और आदिवासी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। इसमें रावण का पुतला जलाने की कोई परंपरा नहीं है। इसके बजाय, विशाल लकड़ी के रथों का निर्माण किया जाता है जिन्हें आदिवासी समुदायों के लोग हाथों से खींचते हैं। इस उत्सव में प्रकृति, माटी और स्थानीय जनजीवन के प्रति अटूट आस्था की झलक देखने को मिलती है, जो इसे बेहद खास और दर्शनीय बनाती है।

मैसूर का भव्य दसेरा: शाही अंदाज, रोशनी से नहाया राजमहल और 'गज-पयना' की परंपरा

कर्नाटक का मैसूर शहर अपने शाही और गरिमामयी 'मैसूर दसेरा' (Mysuru Dasara) के लिए वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है। मैसूर में दशहरे का त्योहार मुख्य रूप से महिषासुर पर माता चामुंडेश्वरी (दुर्गा) की विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। विजयादशमी के दिन मैसूर पैलेस को लाखों दीपों और रंग-बिरंगी लाइटों से इस तरह सजाया जाता है कि पूरा महल सोने की तरह दमक उठता है। इस दिन निकाली जाने वाली पारंपरिक 'जम्बू सवारी' (Jumbo Savari) इस उत्सव का मुख्य आकर्षण होती है, जिसमें एक विशाल हाथी की पीठ पर 750 किलोग्राम सोने से बने हौदे में मां चामुंडेश्वरी की मूर्ति विराजमान होती है। मैसूर के शाही परिवार की अगुवाई में निकलने वाली यह झांकी, सांस्कृतिक नृत्य और पुलिस बल का बैंड पूरे शहर में शाही वैभव का बिखराव करता है। इसे देखने के लिए न केवल दक्षिण भारत बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक खिंचे चले आते हैं।

हिमाचल का बैजनाथ: वह रहस्यमयी जगह जहां रावण का पुतला जलाना माना जाता है अशुभ!

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित प्रसिद्ध 'बैजनाथ' एक ऐसा स्थान है, जहां दशहरे के दिन रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। बैजनाथ में स्थित अति प्राचीन शिव मंदिर के कारण इस स्थान का रावण से गहरा धार्मिक नाता जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लंकापति रावण भगवान शिव का परम भक्त था और उसने इसी स्थान पर कठोर तपस्या करके शिवजी को प्रसन्न किया था और शिवलिंग (वैद्यनाथ) प्राप्त किया था। स्थानीय लोगों की ऐसी अटूट धारणा है कि रावण भगवान शिव का महान भक्त और परम ज्ञानी था, इसलिए इस पावन शिव नगरी में उसका पुतला जलाना भगवान शिव का अनादर करने के समान है। मान्यता यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति इस शहर में रावण का पुतला जलाने की कोशिश करता है, तो उसे या उसके परिवार को भारी अनिष्ट का सामना करना पड़ सकता है। इसी डर और श्रद्धा के कारण यहां के लोग सदियों से विजयादशमी पर रावण दहन नहीं करते और शांतिपूर्वक शिव आराधना करते हैं।

राजस्थान का कोटा दशहरा: जहां लगता है राष्ट्रीय स्तर का विशाल मेला और जलता है गगनचुंबी रावण

राजस्थान की शिक्षा नगरी के रूप में पहचाना जाने वाला कोटा शहर अपने भव्य 'कोटा दशहरा मेला' के लिए पूरे उत्तर भारत में अपनी अलग पहचान रखता है। कोटा में दशहरे का इतिहास करीब 125 साल से भी ज्यादा पुराना है, जिसकी शुरुआत तत्कालीन रियासत के शासकों ने की थी। कोटा के विजय श्री रंगमंच मैदान में आयोजित होने वाला यह दशहरा मेला कई हफ्तों तक चलता है, जहां देश भर से आए कलाकार अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देते हैं। विजयादशमी की शाम को यहां 80 से 100 फीट ऊंचे रावण, कुंभकरण और मेघनाद के विशालकाय पुतलों का दहन किया जाता है, जिन्हें देखने के लिए लाखों की संख्या में जनसैलाब उमड़ पड़ता है। पुतला दहन के दौरान होने वाली भव्य आतिशबाजी और पारंपरिक राजस्थानी लोकगीतों की गूंज इस उत्सव को अत्यंत रोमांचक और ऊर्जावान बना देती है।

सांस्कृतिक धरोहर और अनेकता में एकता का जीवंत उदाहरण है भारतीय दशहरा

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में विजयादशमी को मनाने के ये विविध तरीके इस बात का जीता-जागता प्रमाण हैं कि हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध और सहिष्णु है। चाहे वह हिमाचल के पहाड़ों में देव मिलन का पर्व हो, छत्तीसगढ़ के जंगलों में प्रकृति और देवी पूजा का संगम हो, दक्षिण में मां चामुंडेश्वरी की शाही सवारी हो, या फिर शिव भक्ति के कारण रावण का सम्मान करने की परंपरा हो; ये सभी रूप हमें एक ही सूत्र में पिरोते हैं। यह त्यौहार केवल मनोरंजन या मेलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश देता है कि चाहे रास्ते और तरीके अलग-अलग हों, लेकिन अंततः हर परंपरा का ध्येय बुराई, अहंकार और अज्ञान को मिटाकर अच्छाई, सत्य और सद्भाव की स्थापना करना ही है। इस विजयादशमी पर आप भी भारत की इन अनूठी परंपराओं का आनंद लें और जीवन में अच्छाई के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।