भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स की बढ़ी सिरदर्दी, नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी

भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स की बढ़ी सिरदर्दी, नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी

अमेरिका में अपने करियर का सपना पूरा कर रहे लाखों भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और कुशल कामगारों के लिए वाशिंगटन से एक बेहद चिंताजनक खबर निकलकर सामने आ रही है। अमेरिकी प्रशासन देश की अप्रवासन नीतियों (Immigration Policies) और वर्क परमिट से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव करने जा रहा है, जिसका सबसे सीधा और गहरा असर अमेरिका में रह रहे भारतीय टेक वर्कर्स पर पड़ने वाला है। खबर है कि अमेरिकी सरकार H-1B वीजा धारकों को मिलने वाली एक्सटेंशन प्रक्रिया को अब आसान बनाने की जगह और अधिक कड़ा तथा पेचीदा बनाने की दिशा में काम कर रही है। लंबे समय से ग्रीन कार्ड (Permanent Residency) का इंतजार कर रहे और अमेरिका में अपने परिवारों के साथ रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए यह निर्णय किसी बड़े झटके से कम नहीं माना जा रहा है, क्योंकि अब उन्हें अपनी नौकरी और अमेरिका में प्रवास को बनाए रखने के लिए कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

क्या है अमेरिका का नया वीजा प्लान और क्यों मुश्किल होगा अब H-1B का एक्सटेंशन?

अमेरिका में गैर-इमीग्रेंट H-1B वीजा की मदद से हर साल दुनिया भर से हजारों टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और रिसर्च क्षेत्र के कुशल पेशेवर वहां की शीर्ष कंपनियों में काम करने पहुंचते हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी अकेले भारतीयों की होती है। अब तक लागू व्यवस्था के तहत, तीन साल का शुरुआती वीजा समय समाप्त होने के बाद कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए एक्सटेंशन की अर्जी आसानी से दे देती थीं। लेकिन नए नीतिगत प्रस्तावों के मुताबिक, अब वीजा नवीनीकरण (Visa Renewal) के समय आवेदक की शैक्षणिक योग्यता, कंपनी द्वारा दिए जा रहे वेतन के स्तर (Wage Levels) और अमेरिका के स्थानीय रोजगार बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव का बेहद बारीक और कठोरता से आकलन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, जो नीतियां पहले कंपनियों को स्वतः ही एक्सटेंशन प्रक्रिया में छूट प्रदान करती थीं, उन्हें समाप्त करने की तैयारी की जा रही है, जिससे हर नए आवेदन को बिल्कुल नई अर्जी की तरह ही कड़ी जांच-पड़ताल से गुजरना होगा।

भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और शीर्ष टेक कंपनियों पर पड़ेगा सीधा असर

अमेरिका की सिलिकॉन वैली से लेकर न्यू यॉर्क, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे बड़े राज्यों में संचालित दिग्गज टेक कंपनियां बड़े पैमाने पर भारतीय इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञों पर निर्भर हैं। इस नए नीतिगत बदलाव का सीधा असर भारतीय टेक दिग्गज कंपनियों जैसे टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल के साथ-साथ गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी वैश्विक अमेरिकी कंपनियों के उन कर्मचारियों पर पड़ेगा जो H-1B वीजा पर वहां कार्यरत हैं। एक्सटेंशन की प्रक्रिया कठिन होने से न केवल वीजा अप्रूवल रिजेक्शन रेट (Visa Rejection Rate) बढ़ने की आशंका है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया लंबी खींचने से वीजा धारकों के अमेरिका में काम करने के अधिकार पर भी अस्थायी रूप से संकट खड़ा हो सकता है। यह अनिश्चितता भारतीय इंजीनियरों को अपने रोजगार और भविष्य को लेकर सोचने पर मजबूर कर रही है।

ग्रीन कार्ड बैकलॉग में फंसे भारतीयों की मुश्किलें कई गुना बढ़ीं

भारतीय H-1B वीजा धारकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनका अनिश्चितकालीन ग्रीन कार्ड बैकलॉग है। प्रत्येक देश के लिए तय की गई सात प्रतिशत की कोटा सीमा के कारण भारतीय नागरिकों को परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड पाने के लिए दशकों का इंतजार करना पड़ता है। जब तक किसी कर्मचारी को ग्रीन कार्ड नहीं मिल जाता, उसे हर तीन साल में अपना H-1B वीजा एक्सटेंड करवाना अनिवार्य होता है। वर्तमान में लागू प्रावधानों के तहत जिनका 'आई-140' (Immigrant Petition for Alien Worker) स्वीकृत हो चुका है, वे 6 साल की सामान्य सीमा के बाद भी अनिश्चित काल तक तीन-तीन साल का एक्सटेंशन ले सकते थे। हालांकि, नए नियमों में एक्सटेंशन से जुड़े लचीलेपन पर अंकुश लगाने की बात कही जा रही है, जिससे उन लाखों भारतीय परिवारों की रातों की नींद उड़ गई है जो पिछले 10 से 15 सालों से अमेरिका में रह रहे हैं और उनके बच्चे वहां के स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं।

अमेरिकी कंपनियों के लिए बढ़ेगी लागत और कागजी झंझट

इस नए प्रस्तावित कानून या नीतिगत बदलाव का असर केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और कंपनियों को भी इसका भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। जब H-1B एक्सटेंशन पाना जटिल हो जाएगा, तो कंपनियों को कानूनी शुल्क, अनुपालन (Compliance Costs) और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अत्यधिक भारी धनराशि खर्च करनी पड़ेगी। टेक जगत के उद्योग संगठनों और आव्रजन विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक कड़े नियमों के चलते अमेरिका दुनिया भर की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित करने की अपनी क्षमता खो सकता है। कंपनियां अब भारत, कनाडा, यूरोप या अन्य देशों में स्थित अपने ऑफशोर केंद्रों को मजबूत करने की दिशा में सोच सकती हैं, जिससे अमेरिकी कंपनियों की नवाचार गति पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

परिवारों पर अनिश्चितता का साया: डिपेंडेंट वीजा H-4 धारक भी चिंतित

H-1B नियमों में कड़ाई का एक बड़ा सामाजिक असर भारतीय परिवारों के जीवन पर पड़ेगा। H-1B वीजा धारकों के जीवनसाथी और बच्चों को H-4 वीजा दिया जाता है। पूर्व में लागू नियमों के अनुसार, जिन H-1B धारकों का आई-140 मंजूर हो जाता था, उनके जीवनसाथी को अमेरिका में काम करने की अनुमति (H-4 EAD) मिल जाती थी। लेकिन अगर मुख्य H-1B धारक के एक्सटेंशन में ही देरी या रुकावट आती है, तो उनके जीवनसाथी के कार्य परमिट पर भी सीधा खतरा मंडराने लगेगा। इसके अलावा, जिन बच्चों की उम्र 21 वर्ष होने वाली है, वे कानूनी रूप से अपने माता-पिता के वीजा पर निर्भर नहीं रह पाएंगे और उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है या किसी अन्य स्टूडेंट वीजा में शिफ्ट होना पड़ेगा।

भारतीय सरकार और आव्रजन विशेषज्ञों की सलाह: सतर्कता ही बचाव है

अमेरिका की इस बदलती नीति पर भारत सरकार और विदेश मंत्रालय की भी कड़ी नजर है। भारतीय व्यापार मंडल और आव्रजन वकील अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों को सलाह दे रहे हैं कि वे अपने वीजा नवीनीकरण (Visa Renewal) के दस्तावेज समय से काफी पहले ही तैयार करना शुरू कर दें। सलाह दी जा रही है कि कंपनियां अपने आव्रजन सलाहकारों (Immigration Attorneys) के संपर्क में रहें ताकि किसी भी नियम के लागू होते ही उसके अनुरूप कदम उठाए जा सकें। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में वीजा प्रक्रियाओं में जांच और साक्षात्कार के दौर और सख्त हो सकते हैं, इसलिए कानूनी रूप से सही और पारदर्शी दस्तावेज होना ही किसी भी अप्रत्याशित समस्या से बचाव का एकमात्र जरिया है।