मानसून के बाद पर्यटकों के लिए खुशखबरी! 16 अक्टूबर से फिर गुलजार होगा VTR

मानसून के बाद पर्यटकों के लिए खुशखबरी! 16 अक्टूबर से फिर गुलजार होगा VTR

बिहार और उत्तर भारत के प्रकृति प्रेमियों व वन्यजीव सैलानियों के लिए एक बेहद रोमांचक और सुखद खबर सामने आ रही है। मानसून के दौरान जंगलों के प्राकृतिक संरक्षण, वन्यजीवों के प्रजनन काल और भारी बारिश के कारण सुरक्षा की दृष्टि से बंद रखे जाने वाले वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (VTR) के दरवाजे अब पर्यटकों के लिए एक बार फिर से पूरी तरह से खुलने जा रहे हैं। मानसून सीजन की विदाई के बाद पश्चिमी चंपारण के इन घने जंगलों में रौनक लौटने लगी है और वन विभाग ने आगामी 16 अक्टूबर से वीटीआर में जंगल सफारी और पर्यटकों की आधिकारिक एंट्री शुरू करने की पूरी तैयारियां कर ली हैं। मानसून के इन तीन-चार महीनों में जहां जंगल ने खुद को पुनर्जीवित किया है और हर तरफ हरियाली अपने चरम पर है, वहीं अब सैलानी एक बार फिर से अपनी जिप्सियों के साथ बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीवों के दीदार करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

मानसून के बाद क्यों बंद रखे जाते हैं जंगल और क्या है इसका महत्व?

हर साल मानसून के मौसम के दौरान देश के अधिकांश टाइगर रिजर्व और नेशनल पार्क पर्यटकों के लिए बंद कर दिए जाते हैं, जिसे 'मानसून ब्रेक' कहा जाता है। इसके पीछे मुख्य कारण वन्यजीवों का प्रजनन काल (Mating Season) और जंगलों की कच्ची पगडंडियों व रास्तों का बारिश के कारण भारी कीचड़ से भर जाना होता है। इस दौरान शाकाहारी और मांसाहारी वन्यजीवों को एकांत और शांतिपूर्ण माहौल मिलता है ताकि वे अपने कुनबे को बढ़ा सकें। इसके अलावा भारी बारिश के बीच पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी मुश्किल होता है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व प्रशासन ने भी इन सभी नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए मानसून सीजन में सफारी पर रोक लगाई थी। अब जबकि मानसून पूरी तरह से विदा हो चुका है और मौसम सुहाना व ठंडा होने लगा है, जंगल के रास्ते सूख चुके हैं और वन्यजीव प्रेमी फिर से इस प्राकृतिक खजाने की सैर करने के लिए बेताब हैं।

बंगाल टाइगर और तेंदुओं की बढ़ती संख्या से सैलानियों में जबरदस्त क्रेज

बिहार के इस इकलौते टाइगर रिजर्व में पिछले कुछ वर्षों में बाघों और तेंदुओं की संख्या में जिस तेजी से इजाफा हुआ है, उसने देश भर के वन्यजीव प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में बंगाल टाइगर्स की बढ़ती संख्या के कारण यहां आने वाले पर्यटकों को टाइगर साइटिंग (Tiger Sighting) होने की उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं। 16 अक्टूबर से जब जंगल के दरवाजे खुलेंगे, तो सफारी के दौरान सैलानियों को साल के ऊंचे पेड़ों, घनी झाड़ियों और नदियों के किनारे घूमते हुए बाघ, तेंदुए, भालू, चीतल, सांभर, और जंगली सुअर देखने का रोमांचक अवसर मिलेगा। इसके अलावा, वाल्मीकि नगर और गोनौली रेंज के साथ-साथ हाल ही में जोड़े गए नए मदनपुर रेंज में भी सफारी का लुत्फ उठाया जा सकेगा, जिससे पर्यटकों को जंगल के अंदर घूमने के लिए और अधिक विस्तृत क्षेत्र मिल जाएगा।

स्थानीय अर्थव्यवस्था और होमस्टे कारोबार में आएगी तेजी

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के खुलने का सीधा असर पश्चिम चंपारण के स्थानीय अर्थतंत्र और ग्रामीण विकास पर पड़ता है। मानसून के इन महीनों में जब जंगल बंद रहते हैं, तो स्थानीय जिप ड्राइवर, नेचर गाइड, रिसॉर्ट मालिक और होमस्टे चलाने वाले लोगों का कारोबार काफी हद तक प्रभावित होता है। लेकिन जैसे ही 16 अक्टूबर को वीटीआर के कपाट पर्यटकों के लिए खुलते हैं, इस पूरे क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार तेज हो जाती है। देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले सैलानियों के कारण होटल, ढाबे, हैंडीक्राफ्ट और लोकल टूरिज्म को जबरदस्त बढ़ावा मिलता है। वन विभाग ने भी इस बार स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित करके बतौर नेचर गाइड तैनात किया है, ताकि पर्यटकों को जंगल के कोने-कोने की सटीक जानकारी मिल सके और स्थानीय युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर प्राप्त हो सकें।

ऐसे करें ऑनलाइन बुकिंग और ध्यान रखें जरूरी वन नियम

यदि आप भी इस शानदार शुरुआत के अवसर पर वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी का आनंद लेना चाहते हैं, तो आपको अंतिम समय की भीड़ से बचने के लिए अपनी बुकिंग पहले से ही करवा लेनी चाहिए। वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन परमिट और जिप्सियों की बुकिंग की जा सकती है। इसके अलावा वाल्मीकि नगर स्थित बुकिंग काउंटर से भी ऑफलाइन पास लिए जा सकते हैं। जंगल सफारी के दौरान वन विभाग के नियमों का पालन करना हर पर्यटक के लिए अनिवार्य है। सफारी के वक्त वाहन से नीचे उतरना पूरी तरह प्रतिबंधित है, जंगल में प्लास्टिक या कचरा फेंकना अपराध है और वन्यजीवों को परेशान करने वाले तेज संगीत या चिल्लाने से बचना जरूरी है। इन नियमों का पालन करके आप न केवल अपने सफर को सुरक्षित बनाते हैं बल्कि हमारे अमूल्य वन्यजीवों और पर्यावरण के संरक्षण में भी अपना अहम योगदान देते हैं।