प्रेमासाईं लगाएंगे दिव्य दरबार: 24 से 28 अक्टूबर तक सुनेंगे लोगों की फरियाद
उत्तर प्रदेश की पावन और सामाजिक रूप से जागरूक धरती पर एक बार फिर से धार्मिक आयोजनों, बाबाओं के दरबार और अंधविश्वास की बहसों के बीच एक नया और गरमाता हुआ मामला सामने आया है। आधुनिकता के इस दौर में जहां एक तरफ विज्ञान और तकनीक अंतरिक्ष की गहराइयों को नाप रही है, वहीं दूसरी तरफ आज भी हमारे समाज के एक बड़े हिस्से में चमत्कारी दावों, भूत-प्रेत भगाने और दिव्य दरबार (Divya Darbar) लगाने वाले बाबाओं के प्रति लोगों की अटूट आस्था देखने को मिलती है। इसी कड़ी में आगामी 24 से 28 अक्टूबर तक प्रेमासाईं द्वारा एक भव्य 'दिव्य दरबार' और कथित 'प्रेत दरबार' के आयोजन का ऐलान किया गया है। इस दरबार के जरिए वे लोगों की समस्याएं सुनने और उनके दुखों को दूर करने का दावा कर रहे हैं। हालांकि, जैसे ही इस आयोजन की सुगबुगाहट शुरू हुई, वैसे ही बुद्धिजीवियों, तर्कशास्त्रियों और सामाजिक संगठनों ने इस तरह के आयोजनों की आड़ में फैलाए जा रहे अंधविश्वास पर कड़े सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
आगामी 24 से 28 अक्टूबर तक सजेगा दरबार, उमड़ने लगी है भीड़
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, प्रेमासाईं के इस बहुप्रचारित दिव्य दरबार का आयोजन 24 अक्टूबर से शुरू होकर 28 अक्टूबर तक चलेगा। इस पांच दिवसीय कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा आसपास के राज्यों से भी बड़ी संख्या में पीड़ित, बीमार और समस्याओं से घिरे आम लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचने लगे हैं। आयोजकों का दावा है कि इस दरबार में आने वाले हर शख्स की अर्जी सुनी जाएगी और उनके जीवन में चल रहे तमाम कष्टों व बाधाओं का चमत्कारी समाधान किया जाएगा। कार्यक्रम की सुगबुगाहट तेज होते ही आयोजन स्थल के आसपास तैयारियां युद्ध स्तर पर शुरू हो गई हैं। हालांकि, इस तरह के आयोजनों में जिस प्रकार की भारी भीड़ उमड़ती है, उसे नियंत्रित करना और वहां सुरक्षा व स्वास्थ्य व्यवस्था बनाए रखना स्थानीय प्रशासन के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
'प्रेत दरबार' और चमत्कारी दावों को लेकर खड़े हो रहे हैं तीखे सवाल
इस पूरे आयोजन का सबसे विवादास्पद हिस्सा वह है जिसमें 'प्रेत दरबार' या बुरी आत्माओं को भगाने और भूत-बाधा से मुक्ति दिलाने के दावे किए जा रहे हैं। विज्ञानवादी सोच रखने वाले लोगों और अंधविश्वास निर्मूलन समितियों का कहना है कि इक्कीसवीं सदी में भी इस प्रकार के दरबार लगाकर सीधे-साधे और अनपढ़ लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। लोगों की मानसिक और शारीरिक बीमारियों का इलाज करने के बजाय उन्हें झाड़-फूंक और चमत्कारों के भ्रम जाल में फंसाया जा रहा है। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह के पाखंड से समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temperament) कमजोर होता है, जो संविधान के मूल भावना के भी विपरीत है। बुद्धिजीवियों का सवाल है कि क्या इस तरह के आयोजनों के नाम पर भोले-भाले लोगों की आस्था का आर्थिक और मानसिक शोषण नहीं किया जा रहा है?
प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर बढ़ रही है निगरानी
जैसे-जैसे 24 अक्टूबर की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे इस आयोजन को लेकर प्रशासनिक अमला भी पूरी तरह से सतर्क हो गया है। स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन इस बात की टोह ले रहा है कि कहीं इस दरबार की आड़ में किसी प्रकार की अवैध गतिविधियां, ठगी या अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले कृत्य तो नहीं किए जा रहे हैं। पिछले कुछ समय में उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में इस तरह के ढोंगी बाबाओं और उनके द्वारा किए जाने वाले दावों की कलई कई बार मीडिया और पुलिस जांच में खुल चुकी है। बावजूद इसके, लोगों की अटूट श्रद्धा और अंधविश्वास के इस दोहरे चक्रव्यूह को तोड़ पाना प्रशासन और समाज सुधारकों के लिए हमेशा से एक टेढ़ी खीर साबित हुआ है। प्रशासन की तरफ से यह स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि यदि आयोजन के दौरान कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई गईं या किसी भी प्रकार का भ्रामक व गैर-कानूनी कृत्य पाया गया, तो सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
आस्था बनाम अंधविश्वास की इस लंबी बहस का क्या है निष्कर्ष?
प्रेमासाईं द्वारा लगाए जाने वाले इस दिव्य दरबार और प्रेत दरबार का मामला एक बार फिर से इस चिर-परिचित बहस को जिंदा कर गया है कि आखिर हमारी आस्था की सीमा कहां तक होनी चाहिए और अंधविश्वास की शुरुआत कहां से होती है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी आस्था और विश्वास के अनुसार जीने की आजादी है, लेकिन जब वह विश्वास किसी के शोषण या समाज में वैज्ञानिक सोच के पतन का कारण बनने लगे, तो उस पर विचार करना अनिवार्य हो जाता है। आगामी 24 से 28 अक्टूबर के बीच चलने वाले इस आयोजन पर न सिर्फ स्थानीय लोगों की, बल्कि पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी रहेंगी कि यह दरबार किस दिशा में आगे बढ़ता है और प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है।