समुद्र के बीच स्थित एक ऐसा रहस्यमयी और वीरान शहर
भारत के दक्षिणी छोर पर प्रकृति की खूबसूरती और उसके विध्वंसक रूप का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो देखने वाले के रोंगटे खड़े कर दे। तमिलनाडु के पंबन द्वीप के आखिरी छोर पर बसा धनुषकोडी (Dhanushkodi) आज एक ऐसा रहस्यमयी और वीरान स्थान बन चुका है, जिसे दुनिया 'घोस्ट टाउन' यानी भूतों का शहर के नाम से जानती है। समुद्र की विशाल लहरों के बीच खड़े इस स्थान का इतिहास जितना रोमांचक और पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है, उतना ही दर्दनाक इसका वह काला अतीत है जब एक ही रात में हंसता-खेलता पूरा शहर जलमग्न हो गया था। चारों तरफ समंदर के नीले पानी और सफेद रेत के बीच खड़े खंडहर इस बात की गवाही देते हैं कि यहां कभी इंसानी जिंदगी आबाद हुआ करती थी। आज भले ही यहां स्थायी रूप से कोई नहीं रहता, लेकिन हर साल लाखों सैलानी इस रहस्यमयी और रोमांचक नज़ारे को देखने के लिए यहां खींचे चले आते हैं। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि कैसे एक हंसता-खेलता शहर खंडहर में तब्दील हो गया और इस जगह से जुड़ी अनसुनी कहानियां क्या हैं।
साल 1964 की वह प्रलयकारी रात: जब एक ही चक्रवात में उजड़ गया पूरा का पूरा शहर
दिसंबर 1964 से पहले धनुषकोडी भारत और श्रीलंका के बीच व्यापार और यात्रा का एक बेहद व्यस्त और प्रमुख केंद्र हुआ करता था। यहां रेलवे स्टेशन, कस्टम ऑफिस, अस्पताल, चर्च और बाजार हुआ करते थे, जिसे मिनी लंका या एक छोटा शहर कहा जाता था। लेकिन 22-23 दिसंबर 1964 की वह काली रात इस इलाके के लिए काल बनकर आई। बंगाल की खाड़ी में उठे एक भयानक चक्रवात (Rameswaram Cyclone) ने यहाँ तबाही का ऐसा तांडव मचाया कि जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। करीब 250 से 280 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चली हवाओं और लगभग 25 फीट ऊंची समुद्री लहरों (Storm Surge) ने पल भर में पूरे शहर को अपनी आगोश में ले लिया। उस रात पंबन से धनुषकोडी आने वाली एक पूरी यात्री ट्रेन (Boat Mail) समंदर की तेज लहरों की चपेट में आकर पानी में समा गई, जिसमें सवार सैकड़ों यात्रियों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस कुदरती कहर के बाद मद्रास सरकार ने इस जगह को रहने के लिए पूरी तरह असुरक्षित घोषित कर दिया और यह हमेशा के लिए एक वीरान भूतिया शहर बनकर रह गया।
समुद्र की लहरों के बीच आज भी खड़े हैं खंडहर, पुराणों से जुड़ा है गहरा नाता
आज जब सैलानी धनुषकोडी के पम्बन तट से आगे बढ़ते हैं, तो उन्हें जगह-जगह ब्रिटिश कालीन इमारतों, चर्च के अवशेष और रेलवे स्टेशन के टूटे-फूट खंभे नजर आते हैं। समंदर के खारे पानी और तेज हवाओं के थपेड़े सहते हुए ये खंडहर आज भी उस दौर की कहानी बयां करते हैं। इस जगह की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका धार्मिक और पौराणिक महत्व भी रामायण काल से जुड़ा हुआ है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि भगवान राम ने अपने भक्तों की सहायता से लंका पर चढ़ाई करने के लिए यहीं से 'राम सेतु' का निर्माण शुरू किया था। इस स्थान को 'धनुषकोडी' नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने अपने धनुष की कोटि (छोर) से इस जगह को चिन्हित किया था। यहाँ बंगाल की खाड़ी और भारतीय महासागर का मिलन होता है, जिसे 'अरिचल मुनाई' (Arichal Munai) कहा जाता है, और यहां से श्रीलंका की दूरी महज कुछ ही किलोमीटर रह जाती है।
वीरानियों के बीच पर्यटकों के लिए एडवेंचर और रहस्य का बड़ा केंद्र बना धनुषकोडी
सालों तक दुनिया की नजरों से दूर और वीरान रहने वाला धनुषकोडी अब भारत के सबसे लोकप्रिय ऑफबीट टूरिस्ट डेस्टिनेशंस में शुमार हो चुका है। सरकार और प्रशासन द्वारा पंबन से यहां तक की पक्की सड़क बन जाने के बाद से पर्यटकों का आना-जाना बहुत आसान हो गया है। दोनों तरफ अथाह समंदर और बीच में संकरी सड़क से गुजरते हुए यहां पहुंचना किसी रोमांचक सफर से कम नहीं है। शाम ढलते ही इस इलाके में एक अजीब सा सन्नाटा छा जाता है, जो पर्यटकों के भीतर एक अलग ही रोमांच पैदा करता है। प्रकृति की विनाशलीला और इंसानी संघर्ष का यह जीवंत दस्तावेज देखने वालों को गहरी सोच में डाल देता है कि प्रकृति के आगे इंसानी ताकत कितनी बेबस है। अगर आप भी इतिहास, रहस्य और समंदर की असीम सुंदरता को करीब से महसूस करना चाहते हैं, तो रामेश्वरम यात्रा के दौरान धनुषकोडी की यह यात्रा आपके जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक साबित होगी।