बांग्लादेश के हालात पर उबल पड़ा कोलकाता: सड़कों पर उतरे हजारों लोग, सरकार से पूछे तीखे सवाल

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News India Live, Digital Desk : कहते हैं कि अगर पड़ोसी के घर में आग लगी हो, तो उसकी तपिश अपने घर तक पहुंच ही  जाती है। आज कुछ ऐसा ही नजारा कोलकाता की सड़कों पर देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश में जिस तरह से अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं, इस्कॉन मंदिरों को निशाना बनाया जा रहा है और दीपू दास जैसे लोगों की जान जा रही है, उसने पश्चिम बंगाल के लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया है।

गुस्से में क्यों है 'सिटी ऑफ जॉय'?

हमेशा अपनी मिठास और संस्कृति के लिए जाना जाने वाला कोलकाता आज गुस्से में है। बांग्लादेश में जारी हिंसा के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या नौजवान—हर किसी की जुबान पर बस एक ही बात है कि बांग्लादेश में हमारे भाइयों और बहनों पर हो रहे जुल्म को रोका जाए।

लोगों का कहना है कि वे चुपचाप तमाशा नहीं देख सकते। प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने कई मुख्य मार्गों को जाम कर दिया, जिससे शहर की रफ़्तार थम सी गई। हाथों में तख्तियां और जुबान पर नारेबाजी, माहौल इतना गर्म है कि पुलिस को भी पसीने आ गए।

सिर्फ विरोध नहीं, यह दर्द का रिश्ता है

पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच सिर्फ एक सरहद की लकीर है, लेकिन संस्कृति, भाषा और दिल के तार एक-दूसरे से जुड़े हैं। जब वहां (बांग्लादेश) में किसी मंदिर पर हमला होता है या किसी को उसके धर्म की वजह से मारा जाता है, तो उसकी चोट यहां महसूस होती है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि भारत सरकार को अब "कड़ी निंदा" से आगे बढ़कर कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए।

इस्कॉन के समर्थन में उमड़ी भीड़

खास तौर पर इस्कॉन (ISKCON) से जुड़े लोगों और चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी को लेकर लोगों में बहुत नाराजगी है। लोग मांग कर रहे हैं कि भारत सरकार ढाका पर कूटनीतिक दबाव बनाए और सुनिश्चित करे कि वहां रहने वाले हिंदू सुरक्षित रहें। कई संगठनों ने तो यहां तक चेतावनी दे दी है कि अगर हमले नहीं रुके, तो यह आंदोलन और उग्र हो जाएगा।

भारत सरकार पर दबाव

कोलकाता के इन प्रदर्शनों ने दिल्ली तक अपनी आवाज पहुंचा दी है। यह मामला अब सिर्फ विदेश नीति का नहीं, बल्कि घरेलू भावनाओं का भी बन गया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भारत सरकार इस जन-आक्रोश को कैसे शांत करती है और बांग्लादेश को क्या संदेश देती है।