समंदर की लहरों और सोमनाथ का वो रहस्यमयी स्तंभ, आखिर क्यों विज्ञान भी यहाँ आकर हाथ जोड़ लेता है?

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News India Live, Digital Desk : भारत के गौरवशाली इतिहास और आध्यात्म की जब भी बात होगी, सोमनाथ मंदिर का नाम सबसे ऊपर आएगा। ये वो जगह है जिसे मुगल आक्रमणकारियों ने न जाने कितनी बार मिटाने की कोशिश की, लेकिन ये हर बार और ज्यादा भव्यता के साथ उठ खड़ा हुआ। चलिए, इस पावन धाम के उन पहलुओं पर गौर करते हैं जो इसे खास बनाते हैं।

1. इसे 'प्रथम' ज्योतिर्लिंग ही क्यों कहते हैं?
इसकी जड़ें पौराणिक कथाओं में हैं। कहते हैं कि भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना खुद चंद्रमा (सोम) ने की थी। प्रजापति दक्ष के श्राप से जब चंद्रमा का तेज (चमक) खत्म होने लगा, तब उन्होंने इसी तट पर महादेव की घोर तपस्या की थी। शिव ने प्रकट होकर उन्हें श्राप से मुक्त किया और यहीं निवास करने का वरदान दिया। क्योंकि यहाँ चंद्रमा को उनका गौरव वापस मिला, इसलिए इसे 'सोम-नाथ' यानी चंद्रमा का स्वामी और पहला ज्योतिर्लिंग कहा गया।

2. बाण स्तंभ: प्राचीन भारत के पास भी था 'मैप'?
मंदिर परिसर में एक 'बाण स्तंभ' है, जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। इस स्तंभ पर एक तीर बना है जो समंदर की ओर इशारा करता है। उस पर लिखा है कि यहाँ से सीधे दक्षिण ध्रुव (South Pole) तक कोई भी ज़मीन का हिस्सा या पहाड़ नहीं है। सोचिए, उस दौर में जब सैटेलाइट और गूगल मैप नहीं थे, हमारे पूर्वजों को कैसे पता था कि यहाँ से अंटार्कटिका तक सिर्फ और सिर्फ समंदर ही है?

3. कभी खत्म न होने वाला अस्तित्व
इतिहास गवाह है कि सोमनाथ मंदिर को 17 बार लूटा और नष्ट किया गया। महमूद गजनवी से लेकर औरंगजेब तक, कई आक्रांताओं ने इसे मटियामेट करने की कोशिश की। लेकिन कहते हैं न कि सत्य कभी हारता नहीं। आज़ादी के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प ने इस मंदिर को उसका वर्तमान भव्य रूप दिया। यह मंदिर भारतीयों की 'हार न मानने वाली ज़िद' का प्रतीक है।

4. निर्माण शैली का अदभुत गणित
मंदिर को समुद्र के किनारे कुछ इस तरह बनाया गया है कि खारे पानी और तेज़ हवाओं के बावजूद इसकी मज़बूती आज भी कायम है। इसका शिखर और गर्भगृह कुछ ऐसी ध्वनि तरंगें (Vibrations) पैदा करते हैं, जो यहाँ आने वाले श्रद्धालु को एक अलग ही सुकून और सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं।

5. सोने, चांदी और पत्थर का सफर
पौराणिक मान्यताओं की मानें तो सबसे पहले चंद्रमा ने इसे सोने का बनवाया था, फिर रावण ने इसे चांदी का, श्री कृष्ण ने चन्दन की लकड़ी का और राजा भीमदेव ने इसे पत्थरों से तराशा था। यह दिखाता है कि सदियों से राजा-महाराजा और भक्त इस मंदिर की महत्ता को समझते रहे हैं।