कांग्रेस के लिए खत्म नहीं हो रही मुसीबतें 2025 के झटकों के बाद क्या 2026 में भी डूबेगी लुटिया?

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News India Live, Digital Desk : बीते कुछ सालों से भारतीय राजनीति की हवा जिस तरह बह रही है, उसमें सबसे ज्यादा जद्दोजहद कांग्रेस को करनी पड़ रही है। साल 2025 अब विदाई की ओर है, लेकिन कांग्रेस के लिए यह साल खुशियों से ज्यादा चुनाव हारने की टीस और रणनीतिक विफलताओं की यादें छोड़कर जा रहा है। सवाल सिर्फ एक साल का नहीं है, बल्कि उस रफ्तार का है जो अगले साल यानी 2026 में और भी धीमी पड़ सकती है।

2025: जहाँ उम्मीदें टूटीं और समीकरण बिगड़े

2025 की शुरुआत में ऐसा लगा था कि विपक्ष एक नई मजबूती के साथ उभरेगा, लेकिन चुनावी मैदान में नतीजे इसके उलट रहे। कई राज्यों में पार्टी को जिस जीत का भरोसा था, वहां जनता ने उन्हें नकार दिया। जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का मनोबल इस वक्त थोड़ा गिरा हुआ है। हार की बड़ी वजह केवल 'मोदी लहर' नहीं है, बल्कि अंदरूनी कलह और क्षेत्रीय नेताओं के साथ तालमेल की कमी भी है। पार्टी कहीं न कहीं जनता की नब्ज पकड़ने में चूक गई, जिसका नतीजा वोटिंग मशीनों ने साफ़ दिखा दिया।

क्या 2026 की डगर और भी मुश्किल है?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2026 कांग्रेस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होने वाला। आने वाले समय में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल जैसे अहम राज्यों में चुनावी सुगबुगाहट तेज होगी। यहाँ कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि वो क्षेत्रीय ताकतें भी हैं जो खुद को कांग्रेस से बेहतर विकल्प मानती हैं।

असम में बीजेपी की मजबूत पकड़ है, तो केरल में पार्टी को अपने ही सहयोगियों और विरोधियों के बीच तालमेल बिठाना है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में पार्टी पूरी तरह से अपनी बैसाखियों यानी गठबंधन के भरोसे है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने दम पर कोई बड़ा राज्य बचाने या जीतने की स्थिति में है?

रणनीति में कहाँ हो रही है चूक?

जब हम आम लोगों से या जानकारों से बात करते हैं, तो एक ही बात निकलकर आती है 'कमी जमीन से जुड़ाव की है'। अक्सर देखा गया है कि कांग्रेस के बड़े अभियान सोशल मीडिया पर तो खूब शोर मचाते हैं, लेकिन बूथ लेवल पर आते-आते वे फीके पड़ जाते हैं। इसके उलट, सत्तापक्ष ने अपनी ग्राउंड कनेक्टिविटी को बेहद मजबूत कर लिया है। 2026 में वापसी करने के लिए पार्टी को न सिर्फ राहुल गांधी के चेहरे पर भरोसा करना होगा, बल्कि राज्य स्तर के क्षत्रपों को भी आगे बढ़ाना होगा।

आगे क्या?

राजनीति में कोई भी हार आखिरी नहीं होती, लेकिन अगर आप सबक न लें, तो वह अंत की शुरुआत जरूर बन सकती है। कांग्रेस के पास अब भी वक्त है कि वह अपनी पुरानी गलतियों से सीखे और जनता के उन मुद्दों पर बात करे जो असल में उन्हें प्रभावित करते हैं। सिर्फ पुराने गौरव के सहारे नया चुनाव जीतना आज के दौर में मुमकिन नहीं दिखता।