ग्रीनलैंड पर बढ़ी जंग की आहट, आखिर क्यों डेनमार्क को लगने लगा है कि अमेरिका कर सकता है आक्रमण?
News India Live, Digital Desk: इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है कि देशों ने एक-दूसरे से जमीनें खरीदी हैं, जैसे अमेरिका ने कभी रूस से अलास्का खरीदा था। लेकिन साल 2026 में आकर किसी देश के एक हिस्से को 'खरीदने' की जिद करना किसी बड़ी फिल्म के प्लॉट जैसा लगता है। यह विवाद फिर से तब शुरू हुआ जब अमेरिका (विशेषकर ट्रंप प्रशासन की पुरानी चर्चाओं के संदर्भ में) ने ग्रीनलैंड को खरीदने में अपनी दिलचस्पी दिखाई।
डेनमार्क क्यों है गुस्से में?
ग्रीनलैंड असल में डेनमार्क का एक स्वायत्त हिस्सा (Autonomous territory) है। डेनमार्क का कहना है कि ग्रीनलैंड कोई बिकाऊ संपत्ति नहीं है, जिसे पैसे के दम पर कोई भी बड़ा देश हथिया ले। हालिया विवाद तब बढ़ा जब कुछ ऐसी बातें सामने आईं कि अमेरिका वहाँ अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। डेनमार्क ने यहाँ तक कह दिया कि संप्रभुता (Sovereignty) के साथ खिलवाड़ करना किसी 'आक्रमण' जैसा ही होगा, चाहे वो दबाव के जरिए हो या किसी और रास्ते से।
आखिर ग्रीनलैंड में ऐसा क्या है?
सवाल उठता है कि चारों तरफ बर्फ से ढके इस इलाके के पीछे दुनिया की महाशक्ति इतनी पागल क्यों है? इसके दो बड़े कारण हैं:
- छिपा हुआ खजाना: वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जैसे-जैसे ग्रीनलैंड की बर्फ पिघल रही है, उसके नीचे 'रेयर अर्थ मिनरल्स' (Rare Earth Minerals) का बहुत बड़ा भंडार सामने आ रहा है। ये वो चीजें हैं जिनसे स्मार्टफ़ोन से लेकर इलेक्ट्रिक कार की बैटरी तक बनती है। फिलहाल इस पर चीन का कब्जा है, और अमेरिका चाहता है कि वह अपनी पकड़ मजबूत करे।
- दुश्मनों पर नजर: नक्शे पर देखें तो ग्रीनलैंड एक ऐसी जगह है जहाँ से अमेरिका, रूस और चीन दोनों पर पैनी नजर रख सकता है। यह डिफेंस के लिहाज से एक गोल्ड माइन है।
NATO के लिए सिरदर्द
डेनमार्क और अमेरिका दोनों ही सैन्य संगठन NATO का हिस्सा हैं। अगर दो दोस्तों के बीच ही इस तरह की खींचतान होगी, तो इसका फायदा रूस जैसा कोई भी देश उठा सकता है। डेनमार्क की चेतावनी दरअसल पूरी दुनिया को ये याद दिलाना है कि 21वीं सदी में आप सिर्फ चेक काटकर किसी देश की पहचान नहीं खरीद सकते।