हनुमान चालीसा का असली इतिहास मंदिर में नहीं, जेल की सलाखों के पीछे लिखी गई थी यह महाशक्ति

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News India Live, Digital Desk : ये चौपाइयां सिर्फ शब्द नहीं हैं। भारत के हर बच्चे की जुबान पर, हर डरते हुए दिल में और हर संकट की घड़ी में यही लाइनें सबसे पहले याद आती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस हनुमान चालीसा का पाठ हम रोज सुकून से अपने घरों या मंदिरों में करते हैं, उसका जन्म एक बहुत ही डरावनी और मुश्किल परिस्थिति में हुआ था?

इसकी रचना किसी आश्रम में बैठकर नहीं, बल्कि एक जेल के अंदर हुई थी। और इसके पीछे की कहानी गोस्वामी तुलसीदास जी और मुगल बादशाह अकबर के बीच हुई एक ऐसी टक्कर की है, जिसने इतिहास रच दिया।

जब बादशाह ने की 'राम' की परीक्षा लेने की कोशिश
बात 16वीं सदी की है। गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्ति के चर्चे पूरे देश में हो रहे थे। खबर बादशाह अकबर तक भी पहुंची। अकबर को लगा कि यह शख्स कोई जादूगर है जो चमत्कार करता है। अपनी इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए अकबर ने तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया।

बादशाह ने उनसे कहा, "सुना है आप बड़े करामाती हैं, हमें भी कोई चमत्कार दिखाकर अपना हुनर साबित कीजिये।"
तुलसीदास जी ने बड़ी विनम्रता से सिर झुकाकर कहा, "महाराज, मैं कोई जादूगर नहीं हूँ। मैं तो सिर्फ श्री राम का एक साधारण भक्त हूँ। चमत्कार दिखाना मेरा काम नहीं, वो तो प्रभु की इच्छा है।"

अहंकार और कैद
यह जवाब अकबर के अहंकार को चुभ गया। उसे लगा कि एक साधारण सा संत उसकी बात टाल रहा है। गुस्से में आकर उसने तुलसीदास जी को तुरंत गिरफ्तार करवा दिया और फतेहपुर सीकरी के किले की जेल में डाल दिया। अकबर ने कहा, "अब यहीं सड़ो और दिखाओ अपना चमत्कार।"

जेल बनी जन्मभूमि
तुलसीदास जी ने जेल में रोना-धोना नहीं मचाया। उन्हें अपने राम और हनुमान पर पूरा भरोसा था। कालकोठरी के अंदर बैठे-बैठे उन्होंने हनुमान जी की स्तुति करना शुरू किया। वो लिखते गए, गाते गए।
अवधी भाषा में लिखी गई यह स्तुति 40 चौपाइयों की थी। 40 दिन तक जेल में रहने के दौरान उन्होंने इसे पूरा किया। इसीलिए इसे 'चालीसा' (40 श्लोक) कहा गया।

और फिर हुआ असली 'चमत्कार'...
कहा जाता है कि जैसे ही तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा का पाठ पूरा किया, अचानक फतेहपुर सीकरी और अकबर के महल पर एक आफत आ टूटी। कहीं से हजारों की तादाद में लाल मुंह वाले बंदरों (Monkey Army) ने धावा बोल दिया।

बंदरों ने न महल छोड़ा, न दरबार, और न ही अकबर के सिपाहियों को बख्शा। चारों तरफ अफरातफरी मच गई। तलवारें और तोपें भी उस 'वानर सेना' के आगे बेकार हो गईं।

अकबर का झुका सिर
जब अकबर ने यह नजारा देखा और उसे अपने मंत्रियों से पता चला कि यह सब उस संत को जेल में रखने का नतीजा है, तो उसका पसीना छूट गया। वो नंगे पैर दौड़ता हुआ जेल की तरफ गया और तुलसीदास जी के चरणों में गिरकर माफी मांगी। उसने तुरंत उन्हें रिहा करने का आदेश दिया।

जैसे ही तुलसीदास जी जेल से बाहर आए, बंदरों की फौज वैसे ही गायब हो गई जैसे कभी थी ही नहीं। उस दिन के बाद अकबर ने ऐलान कर दिया कि अब से तुलसीदास और उनके आराध्य के आड़े कोई नहीं आएगा।

हमारे लिए सीख
सोचिए, जो हनुमान चालीसा लोहे की सलाखों को पिघला सकती है और एक बादशाह का घमंड तोड़ सकती है, वो हमारी छोटी-मोटी मुसीबतों को तो पल भर में उड़ा सकती है।
तो अगली बार जब आप हनुमान चालीसा पढ़ें, तो याद रखिएगा कि आप इतिहास की सबसे शक्तिशाली प्रार्थना पढ़ रहे हैं, जिसने हार को जीत में बदल दिया था।

“नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा।”