जगन्नाथ पुरी का रहस्य, आखिर भगवान को क्यों खानी पड़ी थी एक बुज़ुर्ग महिला के हाथ की बनी खिचड़ी?

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News India Live, Digital Desk : ओडिशा का जगन्नाथ पुरी धाम अपनी दिव्यता और भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्तों की आस्था के लिए दुनिया भर में मशहूर है। हम सब जानते हैं कि यहाँ भगवान को हर दिन शाही पकवानों का भोग लगाया जाता है, जिसे हम "छप्पन भोग" कहते हैं। लेकिन, क्या आप यकीन करेंगे कि पुराणों में एक ऐसा किस्सा भी दर्ज है, जब दुनिया का पेट भरने वाले इन देवताओं को खुद भूख से तड़पना पड़ा था?

जी हाँ, यह कहानी है उस समय की जब भगवान जगन्नाथ और उनके बड़े भाई बलभद्र को 12 साल तक अन्न का एक दाना भी नसीब नहीं हुआ था। आइए, बड़े ही आसान शब्दों में जानते हैं इस दिलचस्प और सीख देने वाली कहानी को।

आखिर माँ लक्ष्मी क्यों रूठ गईं?

कहते हैं कि एक बार की बात है, माँ लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से किसी बात पर बेहद नाराज़ हो गईं। वजह यह थी कि माँ लक्ष्मी को लगा कि भगवान जगन्नाथ खाने-पीने में इतने मगन रहते हैं कि गृहस्थी के नियमों और भोजन के महत्व (अन्न की बर्बादी या कद्र न करना) को कम आंक रहे हैं।

गुस्से में आकर माँ लक्ष्मी ने खुद को मंदिर से और भगवान की रसोई से अलग कर लिया। अब चूंकि माँ लक्ष्मी ही 'अन्नपूर्णा' हैं, उनके जाते ही मानो सारा वैभव और भोजन भी उनके साथ चला गया। इसका नतीजा यह हुआ कि जगन्नाथ मंदिर के भंडार खाली हो गए। न सिर्फ़ मंदिर में, बल्कि मान्यता है कि उस वक्त राज्य में ऐसा अकाल पड़ा कि देवताओं तक को खाना नहीं मिल रहा था।

जब भगवान को मांगनी पड़ी भीख

पौराणिक कथाओं के मुताबिक, स्थिति इतनी बुरी हो गई कि भगवान जगन्नाथ और उनके भाई बलभद्र को भूखे पेट इधर-उधर भटकना पड़ा। जो दुनिया को खाना खिलाते हैं, वो आज खुद भीख मांगने को मजबूर थे। लेकिन माँ लक्ष्मी की माया ऐसी थी कि जिस दरवाजे पर वे जाते, वहां या तो खाना खत्म हो चुका होता या लोग उन्हें मना कर देते।

कहा जाता है कि वे पूरे 12 साल तक इसी तरह भूख और प्यास से व्याकुल रहे। न पानी मिला, न भोजन। यह लीला शायद यह समझाने के लिए थी कि जीवन में 'अन्न' और 'गृहलक्ष्मी' का सम्मान कितना ज़रूरी है।

बुज़ुर्ग महिला और वो खिचड़ी

जब भूख बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो भगवान एक बुज़ुर्ग महिला की कुटिया के पास पहुंचे। दरअसल, यह बुज़ुर्ग महिला कोई और नहीं बल्कि वेष बदलकर बैठीं माँ लक्ष्मी ही थीं। दोनों भाइयों ने उनसे भोजन मांगा। महिला ने कहा कि, "मेरे पास देने को शाही खाना तो नहीं है, बस थोड़ी सी खिचड़ी बना सकती हूँ।"

भूख से बेहाल भगवान को उस वक्त वह खिचड़ी किसी अमृत से कम नहीं लगी। माँ लक्ष्मी (बुज़ुर्ग महिला) ने जब वह साधारण सी खिचड़ी परोसी, तो भगवान जगन्नाथ और बलभद्र ने उसे इतने चाव से खाया कि उन्हें तृप्ति मिल गई। खाते ही उन्हें एहसास हो गया कि यह स्वाद साधारण हाथों का नहीं, बल्कि माँ लक्ष्मी का ही है।

और तब से शुरू हुई परंपरा...

इस घटना के बाद भगवान जगन्नाथ ने माँ लक्ष्मी को मना लिया और वचन दिया कि अब से वे कभी भोजन का अपमान नहीं करेंगे और रसोई का मान हमेशा बना रहेगा। यही वजह है कि आज भी जगन्नाथ मंदिर में चाहे जितने भी पकवान बनें, लेकिन 'खिचड़ी' का महाप्रसाद सबसे पवित्र और भगवान का प्रिय माना जाता है। इसे 'करमा बाई की खिचड़ी' या 'खिचड़ी प्रसाद' के नाम से जाना जाता है।

सीख क्या मिलती है?
यह कथा हमें सिखाती है कि घर में अन्न और घर की स्त्री (लक्ष्मी) का सम्मान सबसे ऊपर होना चाहिए। जहाँ अन्न का निरादर होता है, वहां बरकत कभी नहीं रुकती। तो अगली बार जब आप अपनी थाली में खाना छोड़ें, तो भगवान जगन्नाथ की यह कहानी ज़रूर याद कर लें।