फेसबुक का भविष्य एक 29 साल के नौजवान के हाथ में सुरक्षित है? पूर्व चीफ साइंटिस्ट ने खड़े किए तीखे सवाल

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News India Live, Digital Desk: जब हम AI जैसी पेचीदा चीज़ों की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में सालों के अनुभव वाले और बालों में सफेदी लिए हुए किसी वैज्ञानिक की छवि उभरती है। लेकिन फेसबुक की पेरेंट कंपनी 'मेटा' ने हाल ही में कुछ ऐसा किया कि पुराने दिग्गजों की भृकुटियां तन गईं। मार्क जुकरबर्ग ने मेटा के महत्वपूर्ण AI डिविजन की कमान एक 29 साल के युवक को थमा दी है।

अब आप सोचेंगे कि इसमें गलत क्या है? मार्क जुकरबर्ग ने भी तो छोटी उम्र में ही शुरुआत की थी। लेकिन असली पेंच यहाँ अनुभव (Experience) को लेकर फंसा है। मेटा के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक ने इस फैसले को लेकर अपनी असहमति जताई है। उनका मानना है कि AI कोई साधारण प्रोडक्ट नहीं है जिसे सिर्फ कोडिंग और मार्केटिंग से चलाया जा सके। यह एक गंभीर विज्ञान है जिसके लिए गहराई और दशकों के अनुभव की ज़रूरत होती है।

विवाद आखिर है क्या?
दरअसल, सारा मामला इस बात पर टिका है कि क्या एक 29 साल का लीडर उन वैज्ञानिकों की टीम को संभाल पाएगा जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी रिसर्च में बिता दी है। पूर्व चीफ साइंटिस्ट का सवाल यह है कि क्या कम उम्र के लीडर के पास वो 'विज़न' होगा जो एथिकल और लॉन्ग-टर्म AI डेवलप करने के लिए चाहिए? क्या यह फैसला मेटा को दुनिया की रेस में सबसे आगे ले जाएगा या यह सिर्फ ज़करबर्ग का एक और जोखिम भरा दांव है?

अंदरखाने की खबरें कहती हैं कि कंपनी के पुराने कर्मचारियों और नई मैनेजमेंट के बीच एक वैचारिक जंग छिड़ गई है। पुराने लोग तजुर्बे को प्राथमिकता दे रहे हैं, वहीं मार्क जुकरबर्ग 'मूव फास्ट एंड ब्रेक थिंग्स' (तेजी से आगे बढ़ो और बदलाव लाओ) वाली नीति पर अडिग नज़र आ रहे हैं।

नौजवानों की बढ़ती धमक
हालांकि, यह भी सच है कि दुनिया अब युवाओं के आइडियाज़ पर चल रही है। ओपन-एआई (OpenAI) से लेकर गूगल तक, हर जगह कम उम्र के लोगों ने बड़े बदलाव किए हैं। लेकिन मेटा जैसी कंपनी, जिसके पास अरबों लोगों का डेटा है, वहां ऐसी नियुक्ति एक नई मिसाल भी पेश कर सकती है और एक बड़ी विफलता का कारण भी बन सकती है।

यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि यह 29 वर्षीय लीडर अपनी आलोचनाओं को चुप करा पाते हैं या पूर्व चीफ साइंटिस्ट की आशंकाएं सच साबित होती हैं। फिलहाल, मेटा में चल रही यह जुबानी जंग यह तो साफ़ कर देती है कि AI की दुनिया में कुर्सी पाना आसान है, लेकिन उस पर टिके रहना और सबका विश्वास जीतना एक बड़ी चुनौती है।