सुकमा में बदला हवाओं का रुख जब 26 माओवादियों ने तोड़ा संगठन का साथ, क्या वाकई बस्तर में अब शांति का दौर आने वाला है

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News India Live, Digital Desk : छत्तीसगढ़ का सुकमा जिला लंबे समय से नक्सलवाद की तपिश झेल रहा है। यहाँ की मिट्टी ने अपनों का खून भी देखा है और हिंसा का खौफ भी। लेकिन इसी सुकमा में एक शांत क्रांति आकार ले रही है। हाल ही में 26 सक्रिय माओवादियों ने एक साथ पुलिस और प्रशासन के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इन लोगों में कई बड़े कैडर शामिल थे, जिनकी तलाश में सुरक्षा बल सालों से जंगलों की खाक छान रहे थे।

क्यों बदला इन 26 लोगों का मन?
ये लोग कोई एक-दो साल से नहीं, बल्कि दशकों से इस विचारधारा से जुड़े हुए थे। जब इनसे बातचीत की गई, तो एक बात साफ़ निकलकर आई— 'मोहभंग'। जंगल की उस ज़िंदगी में जहाँ सिर्फ डर था, अभाव था और अपनों से दूरी थी, वहां अब इन लोगों को यह अहसास होने लगा है कि माओवादी विचारधारा का रास्ता सिर्फ तबाही की ओर जाता है। सरकार की 'नई सुबह' जैसी पुनर्वास नीतियां (Rehabilitation Policy) इन्हें अब यह यकीन दिला रही हैं कि बंदूक छोड़कर वे अपनी और अपने परिवार की किस्मत बदल सकते हैं।

64 लाख के 'इनामी' जब सरेंडर करने आए
प्रशासन के लिए यह इसलिए भी बड़ी जीत है क्योंकि इन सरेंडर करने वालों में 1-1 लाख से लेकर 8-8 लाख तक के इनामी शामिल थे। इनके ऊपर कुल 64 लाख रुपये का सरकारी इनाम था। इन आंकड़ों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि संगठन के भीतर ये कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। इनका साथ छोड़ना माओवादी नेटवर्क के लिए एक बड़ा झटका है।

आम लोगों की आँखों में अब 'विकास' की चमक है
दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे इलाकों में अब सड़कें पहुँच रही हैं, स्कूल खुल रहे हैं और लोगों को मुफ्त राशन और दवाइयां मिल रही हैं। जब सरेंडर करने वाले माओवादियों ने अपने गाँवों को बदलते देखा, तो उनके मन में भी मुख्यधारा का हिस्सा बनने की इच्छा जागी। उन्होंने न केवल अपने हथियार सौंपे, बल्कि इस शपथ के साथ वापस लौटे कि वे अब लोकतंत्र में विश्वास रखेंगे।

आगे की राह क्या है?
सरकार इन सभी 26 लोगों को तुरंत राहत राशि देने के साथ-साथ इनके कौशल विकास (Skill Development) पर भी काम करेगी ताकि ये भविष्य में अपना कोई सम्मानजनक काम शुरू कर सकें।

छत्तीसगढ़ की इस लाल मिट्टी से अब बारूद की महक धीरे-धीरे कम हो रही है और वहां अमन-चैन की उम्मीद बढ़ रही है। क्या आपको भी लगता है कि विकास के जरिए ही नक्सलवाद का जड़ से अंत मुमकिन है? हमें अपनी राय ज़रूर बताएं।