सुप्रीम कोर्ट का डंडा और B.Ed वालों की सांसें अटकीं क्या बिना ब्रिज कोर्सके अब जाएगी नौकरी?

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News India Live, Digital Desk: शिक्षक बनना और सरकारी नौकरी पाना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता। एक उम्मीदवार बरसों मेहनत करता है, तब जाकर हाथ में नियुक्ति पत्र (Joining Letter) आता है। लेकिन जरा सोचिए, आप सालों से स्कूल में पढ़ा रहे हों और अचानक एक दिन आपको पता चले कि आपकी नौकरी एक ऐसे कोर्स की वजह से खतरे में है, जिसे या तो आपने किया नहीं या आपको करवाया ही नहीं गया?

इन दिनों प्राइमरी स्कूलों में पढ़ा रहे कई B.Ed डिग्री वाले शिक्षकों के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और फाइलों के बाहर आए सच ने एक नया भूचाल ला दिया है। मामला है '6 महीने के ब्रिज कोर्स (Bridge Course)' का।

आइए, इस पूरे मामले को बहुत आसान भाषा में समझते हैं।

आखिर ये पेंच फंसा कहां है?

देखिए, नियम यह था कि अगर आप B.Ed पास हैं और कक्षा 1 से 5 (प्राइमरी) के बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, तो नौकरी मिलने के 2 साल के अंदर आपको एक स्पेशल ट्रेनिंग करनी होगी। इसे 'ब्रिज कोर्स' कहा जाता है।

यह क्यों जरूरी है? क्योंकि B.Ed में बड़ी क्लास के बच्चों को पढ़ाना सिखाया जाता है, जबकि छोटे बच्चों (प्राइमरी) को संभालने और सिखाने का तरीका बिल्कुल अलग होता है। इसलिए, सरकार ने यह शर्त रखी थी कि NIOS या किसी मान्यता प्राप्त संस्था से यह 6 महीने का कोर्स करना होगा ताकि B.Ed वाले भी छोटे बच्चों को सही से समझ सकें।

बड़ा खुलासा: बिना कोर्स किए ही चल रही है नौकरी!

ताजा जानकारी जो सामने आ रही है, वो चौंकाने वाली है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद जब परतें खोली गईं, तो पता चला कि हजारों ऐसे शिक्षक हैं जो नौकरी तो पा गए, वेतन भी उठा रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह अनिवार्य ब्रिज कोर्स किया ही नहीं।

इसमें कई बार गलती शिक्षकों की नहीं होती। कई जगह तो शिक्षा विभाग ने या सरकार ने यह कोर्स समय पर आयोजित ही नहीं करवाया। अब जब मामला कोर्ट-कचहरी और नियमों के तराजू पर तौला जा रहा है, तो इन शिक्षकों के माथे पर चिंता की लकीरें आ गई हैं।

तो क्या अब नौकरी चली जाएगी?

यही सबसे बड़ा डर है। B.Ed बनाम BTC (D.El.Ed) की लड़ाई पहले ही बहुत गर्म है। ऐसे में यह खुलासा कि 'साहब, इन्होंने तो अनिवार्य ट्रेनिंग ही पूरी नहीं की', विपक्षियों को और मजबूती दे रहा है।

अगर नियमों का सख्ती से पालन हुआ, तो उनकी नियुक्ति पर सवाल उठ सकते हैं। एक तरफ वो परिवार हैं जो इन शिक्षकों की तनख्वाह पर चल रहे हैं, और दूसरी तरफ कानून का डंडा है। यह स्थिति उन हजारों टीचर्स के लिए मानसिक तनाव का कारण बन गई है।

अब आगे क्या?

फिलहाल तो हर कोई सरकार और कोर्ट की तरफ देख रहा है। क्या इन शिक्षकों को एक और मौका मिलेगा? क्या सरकार कोई बीच का रास्ता निकालेगी? या फिर कोई कड़ा फैसला लिया जाएगा? जो भी हो, लेकिन एक बात साफ है सरकारी नौकरी में एक छोटी सी 'टेक्निकल' चूक भविष्य में कितनी बड़ी मुसीबत बन सकती है, यह मामला उसका जीता-जागता सबूत है।

हम बस उम्मीद कर सकते हैं कि किसी मेहनती शिक्षक के साथ अन्याय न हो, लेकिन नियम तो नियम हैं।