Student Welfare : उत्तराखंड में बच्चों पर पढ़ाई का 'अतिरिक्त' बोझ,छठवीं कक्षा में 500 पेज की किताबों से परेशान छात्र

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News India Live, Digital Desk:  Student Welfare : उत्तराखंड में स्कूली बच्चों के कंधों पर पढ़ाई का बोझ लगातार बढ़ रहा है, और यह चिंता अब छठी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से खड़ी हो गई है। यहाँ 500 से अधिक पन्नों की किताबें उनके बस्ते का ऐसा भारी हिस्सा बन रही हैं कि वे इससे शारीरिक रूप से भी जूझ रहे हैं। यह एक ऐसी समस्या है जो सिर्फ किताबों के वजन तक सीमित नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और उनकी शिक्षा के प्रति रुचि को भी प्रभावित कर रही है।

जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा प्रकाशित कक्षा छह की हिंदी की पाठ्यपुस्तक ही अकेले लगभग 500 पन्नों की है। इसी तरह गणित की किताब भी 525 पन्नों की बताई जा रही है। इतनी किताबों को एक साथ अपने बस्ते में ढोना न सिर्फ मुश्किल है, बल्कि छोटे बच्चों के लिए यह किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं। इन भारी भरकम बस्ते के चलते बच्चों को कई तरह की शारीरिक परेशानियाँ झेलनी पड़ रही हैं, जिनमें कमर और गर्दन का दर्द सबसे आम है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि इतनी कम उम्र में इतना अधिक वजन उठाने से उनकी रीढ़ की हड्डी पर बुरा असर पड़ सकता है, जिसका दीर्घकालिक दुष्प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

अभिभावकों की यह चिंता स्वाभाविक है। वे सवाल उठा रहे हैं कि आखिर क्यों इतनी मोटी किताबें छापी जा रही हैं, जबकि पाठ्यक्रम को दो भागों में विभाजित करके बच्चों पर पड़ने वाले बोझ को कम किया जा सकता है। शिक्षकों का भी यही मानना है कि इतनी अधिक सामग्री बच्चों को पढ़ाई से विमुख कर सकती है, क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा अनावश्यक होता है या बच्चों के सीखने के स्तर से कहीं अधिक होता है। 

राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे नियम बने हैं कि बच्चों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के कुल वजन के दस प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। परंतु इतनी मोटी किताबों के साथ इन नियमों का पालन करना असंभव सा हो गया है। पूर्व में, पहली कक्षा के बच्चों के बस्तों के बढ़ते बोझ पर भी चिंता जताई गई थी, जिसके बाद पाठ्यक्रम में कुछ बदलाव किए गए थे। उत्तराखंड राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (SCERT) से भी इस दिशा में उचित कदम उठाने की अपील की गई है, ताकि इस समस्या का समाधान जल्द से जल्द हो सके और हमारे भविष्य के कर्णधार, बच्चे स्वस्थ रहते हुए बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकें।