Story of King Moradhwaj : जब भगवान ने खुद मांगी अपने भक्त के बेटे की बलि, रूह कांप जाएगी ये कहानी पढ़कर
News India Live, Digital Desk : हम सब जानते हैं कि भगवान श्री कृष्ण प्रेम और करुणा के सागर हैं। लेकिन, हमारे पुराणों में कुछ ऐसी कहानियां भी छिपी हैं, जहाँ उनका एक अलग ही रूप देखने को मिलता है। एक ऐसी ही कहानी है जब उन्होंने अपने एक भक्त को ऐसी 'कठिन परीक्षा' में डाला, जिसे सुनकर ही किसी आम इंसान का कलेजा मुंह को आ जाए।
यह कहानी है राजा मोरध्वज की और अर्जुन के टूटे हुए घमंड की। आइए, इस रोंगटे खड़े कर देने वाली गाथा को जानते हैं।
अर्जुन का वहम और कृष्ण की मुस्कान
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडवों की जीत हुई थी। धीरे-धीरे अर्जुन के मन में यह बात घर कर गई थी कि पूरी दुनिया में श्री कृष्ण का उनसे बड़ा कोई भक्त नहीं है। वे सोचने लगे थे कि उन्होंने भगवान के लिए इतना कुछ किया है, तो वे ही सर्वोत्तम हैं। श्री कृष्ण, जो अंतर्यामी हैं, अपने दोस्त और सखा अर्जुन के इस बढ़ते हुए अहंकार को देख रहे थे। वे जानते थे कि भक्ति में अहंकार के लिए कोई जगह नहीं होती।
एक दिन भगवान ने अर्जुन से कहा, "चलो, आज तुम्हें अपने एक असली भक्त से मिलवाता हूँ।"
साधु का भेष और अजीब मांग
कृष्ण और अर्जुन ने साधु का भेष धरा और राजा मोरध्वज के राज्य में पहुंच गए। राजा मोरध्वज अपनी दानवीरता और धर्म के लिए मशहूर थे। राजा ने जब साधुओं को देखा तो बड़े आदर से उनका स्वागत किया और पूछा कि वे उनकी क्या सेवा कर सकते हैं।
कृष्ण (साधु के भेष में) बोले, "राजन, मेरा यह शेर (कुछ कथाओं में बाघ) बहुत भूखा है। लेकिन समस्या यह है कि यह आम मांस नहीं खाता। यह तभी शांत होगा जब इसे किसी ऐसे लड़के का मांस मिले, जिसे उसके माता-पिता खुद अपने हाथों से आरी से काटकर खिलाएं। और हाँ, शर्त यह है कि काटते वक्त दोनों की आंखों से एक बूंद आंसू नहीं गिरना चाहिए, वरना यह खाना नहीं खाएगा।"
कठोर परीक्षा की घड़ी
यह सुनकर अर्जुन भी सन्न रह गए। कोई भी पिता ऐसा कैसे कर सकता है? लेकिन राजा मोरध्वज और उनकी पत्नी अपनी भक्ति और वचन से पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने ही बेटे 'ताम्रध्वज' को बुला लिया। सोचिए उस मंजर को, एक माता-पिता अपने ही जिगर के टुकड़े के सिर पर आरी रख रहे थे।
वह एक आंसू जिसने सब बदल दिया
जैसे ही राजा और रानी ने बेटे को आरी से काटना शुरू किया, एक भयानक दृश्य उपस्थित हुआ। तभी साधु (कृष्ण) ने देखा कि लड़के (ताम्रध्वज) की बाईं आँख से एक आंसू टपक रहा है।
कृष्ण ने तुरंत हाथ रोका और कहा, "बस! मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता। इस लड़के की आंख में आंसू है, इसका मतलब यह दुखी है और जबरदस्ती बलि दी जा रही है। मेरा शेर दुखी मन से दिया गया भोजन नहीं करेगा।"
बेटे का जवाब और अर्जुन का सरेंडर
तभी उस आधे कटे हुए शरीर से ताम्रध्वज ने जो कहा, उसने वहां खड़े अर्जुन को हिला कर रख दिया। बेटे ने कहा—
"प्रभु, यह आंसू दुःख का नहीं है। यह तो इसलिए है क्योंकि मेरे शरीर का दाहिना हिस्सा आपके काम आ रहा है (मुक्ति पा रहा है), लेकिन बायां हिस्सा अभागा है जो बेकार फेंका जाएगा। मुझे दुःख है कि मेरा पूरा शरीर आपकी सेवा में नहीं लग सका।"
यह सुनते ही अर्जुन की आँखों से पर्दा हट गया। उन्हें समझ आ गया कि समर्पण (Surrender) क्या होता है।
कृष्ण का असली रूप
भक्त की इतनी निष्ठा देखकर श्री कृष्ण अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए। वे तुरंत अपने असली रूप में आए। उन्होंने राजा मोरध्वज के बेटे को फिर से जीवित कर दिया और उसे गले लगा लिया। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि भक्त वो नहीं जो सिर्फ साथ रहे, भक्त वो है जो सब कुछ खोकर भी ईश्वर की रज़ा में राज़ी रहे।
यह कहानी हमें सिखाती है कि ईश्वर हमारी परीक्षा हमारे भले के लिए ही लेते हैं, ताकि हम सोने की तरह और निखर कर बाहर आएं।