Smartphone Export Crisis: अमेरिका-ईरान युद्ध की आहट से भारत के स्मार्टफोन एक्सपोर्ट पर संकट, 25% तक गिर सकता है निर्यात
News India Live, Digital Desk: मिडिल ईस्ट की धरती पर मंडराते युद्ध के बादलों और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सरहदों से निकलकर वैश्विक बाजारों तक पहुँच गया है। भारत, जो तेजी से दुनिया का नया स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग हब बनकर उभर रहा है, इस भू-राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में आ सकता है। जानकारों का मानना है कि यदि खाड़ी देशों में यह तनाव लंबा खिंचता है, तो 'मेक इन इंडिया' के तहत बने स्मार्टफोन्स के निर्यात में 22 से 25 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।
निर्यात में भारी गिरावट का असली कारण
भारत के स्मार्टफोन एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए सबसे बड़ी चुनौती लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन में आने वाली रुकावटें हैं। युद्ध के कारण एयरस्पेस (हवाई मार्ग) पर पाबंदियां लग सकती हैं और प्रमुख शिपिंग रूट्स के बंद होने या बदलने का खतरा बढ़ गया है।
डिलीवरी में देरी: माल की समय पर डिलीवरी न होने से न केवल आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि वैकल्पिक रास्तों के इस्तेमाल से शिपिंग की लागत भी कई गुना बढ़ जाएगी।
बढ़ता खर्च: लॉजिस्टिक खर्च बढ़ने का सीधा असर स्मार्टफोन की कीमतों और कंपनियों के मुनाफे पर पड़ेगा।
UAE पर निर्भरता बनी सबसे बड़ी चुनौती
भारत के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) स्मार्टफोन एक्सपोर्ट का सबसे बड़ा ट्रांजिट हब है। डेटा के अनुसार, भारत से निर्यात होने वाले हर 10 में से लगभग 4 फोन पहले UAE जाते हैं, जहाँ से उन्हें दुनिया के अन्य हिस्सों में री-एक्सपोर्ट किया जाता है। अमेरिका के बाद UAE भारत का दूसरा सबसे बड़ा एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन है, जिसका सालाना कारोबार करीब 3.1 बिलियन डॉलर है। खाड़ी क्षेत्र में किसी भी तरह की अशांति सीधे भारत के निर्यात आंकड़ों को प्रभावित करेगी।
एप्पल जैसे दिग्गजों बनाम छोटे निर्यातकों का संकट
मिडिल ईस्ट के इस संकट का असर हर कंपनी पर एक जैसा नहीं होगा:
बड़े खिलाड़ी (Apple): एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों के पास एक अत्यंत डायवर्सिफाइड और मजबूत सप्लाई चेन नेटवर्क है। वे जरूरत पड़ने पर दूसरे रूट्स से अपना माल निकाल सकती हैं। वर्तमान में एप्पल अपने ग्लोबल प्रोडक्शन का करीब 25% हिस्सा भारत में बना रहा है।
छोटे निर्यातक: छोटे व्यापारियों के लिए यह स्थिति संकटपूर्ण हो सकती है क्योंकि वे चुनिंदा ट्रेड रूट्स पर ही निर्भर रहते हैं। उनके लिए इन्वेंट्री जमा होने और माल फंसने का बड़ा जोखिम खड़ा हो गया है।
आगे की राह और रिस्क मैनेजमेंट
भारत का मैन्युफैक्चरिंग बेस निसंदेह मजबूत हो रहा है, लेकिन मिडिल ईस्ट का यह संकट याद दिलाता है कि एक 'ग्लोबल सप्लायर' बनने के लिए रिस्क मैनेजमेंट और वैकल्पिक व्यापार मार्गों का होना कितना जरूरी है। फिलहाल भारतीय एक्सपोर्टर्स 'वेट एंड वॉच' (इंतजार करो और देखो) की स्थिति में हैं। यदि तनाव कम नहीं होता है, तो इंडस्ट्री को शिपिंग रूट्स में बदलाव और बढ़ती लागत के लिए तैयार रहना होगा। हालांकि, भारत की मजबूत वैश्विक साझेदारियां इस आर्थिक तूफान को झेलने का माद्दा रखती हैं।