श्रीराम' का पहला युद्ध वह सुंदरी यक्षिणी जो बन गई आदमखोर राक्षसी,जानिए ताड़का वध के पीछे की असल मजबूरी

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News India Live, Digital Desk: रामायण की कहानियाँ सिर्फ धार्मिक किस्से नहीं हैं, बल्कि जीवन जीने के सबक हैं। ऐसी ही एक कहानी है ताड़का की। अक्सर लोग ताड़का को सिर्फ एक भयानक राक्षसी के तौर पर जानते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि वह हमेशा से वैसी नहीं थी? उसके पीछे एक गहरी और भावुक कहानी छिपी है।

कौन थी ताड़का? (श्राप से पहले का सफर)
शायद आप जानकर हैरान हो जाएं कि ताड़का जन्म से राक्षसी नहीं, बल्कि एक बेहद बलशाली 'यक्षिणी' थी। वह सुकेतु नामक यक्ष की बेटी थी। ताड़का में एक हजार हाथियों का बल था। उसकी शादी 'सुन्द' से हुई थी और उसके दो बेटे थे— मारिच और सुबाहु।

हालाँकि, एक समय ऐसा आया जब उसके अहंकार और उत्पात से दुखी होकर महर्षि अगस्त्य ने उसे और उसके परिवार को श्राप दे दिया। इसी श्राप के कारण वह एक सुंदर यक्षिणी से भयानक और मांस खाने वाली राक्षसी बन गई। उसका ठिकाना दंडकारण्य (जिसे ताड़का वन भी कहा जाता था) बन गया, जहाँ से भी कोई गुजरता, वह उसे मारकर खा जाती थी।

ऋषि विश्वामित्र का आगमन और श्रीराम का संकल्प
महान ऋषि विश्वामित्र के यज्ञों में ताड़का और उसके बेटे अक्सर बाधा डालते थे। ऋषि को पता था कि इसका समाधान साधारण नहीं होगा। तब वे अयोध्या के राजा दशरथ के पास गए और राम-लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने की विनती की। उस समय भगवान राम किशोर थे, लेकिन विश्वामित्र जानते थे कि असुरों के अंत की शुरुआत इन्हीं के हाथों होनी है।

श्रीराम का संकोच: क्या स्त्री पर बाण चलाना उचित है?
जब श्री राम और लक्ष्मण ताड़का के वन में पहुँचे, तो ताड़का ने अपनी पूरी शक्ति से हमला कर दिया। पत्थर बरसने लगे और धूल की आंधी चलने लगी। लेकिन भगवान राम के मन में एक बड़ा सवाल था। वे धर्म की मर्यादा के ज्ञाता थे, उनके मन में संकोच था कि क्या एक 'स्त्री' का वध करना शास्त्र सम्मत है?

तब महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा, "हे राम! जब कोई समाज और धर्म का शत्रु बन जाए और निर्दोषों की जान लेने लगे, तो राजा और रक्षक का धर्म सिर्फ प्रजा को बचाना होता है। वहां पुरुष या स्त्री का भेद गौण हो जाता है।"

अधर्म का अंत और राम का पराक्रम
गुरु की आज्ञा पाकर श्रीराम ने अपना धनुष ताना और एक ही बाण से ताड़का का वध कर दिया। ताड़का के अंत के साथ ही वन का सन्नाटा और खौफ खत्म हो गया। देवताओं ने भी स्वर्ग से फूलों की वर्षा की, क्योंकि यह संसार को असुरों से मुक्त करने की दिशा में प्रभु का पहला कदम था।

इस कथा से हमें क्या सीखने को मिलता है?
ताड़का वध की कहानी हमें बताती है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, सत्य के सामने वह ज्यादा देर नहीं टिकती। साथ ही, यह प्रसंग श्रीराम के उस चरित्र को भी दिखाता है कि वे अपनी शक्ति का इस्तेमाल केवल मजबूरी और जन-कल्याण के लिए ही करते थे।