Samyukt Kisan Morcha : पंजाब की लैंड पूलिंग पॉलिसी पर बहस क्या 3 कृषि कानूनों जैसी चुनौती बन सकती है

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News India Live, Digital Desk: Samyukt Kisan Morcha : पंजाब सरकार की महत्वाकांक्षी 'लैंड पूलिंग पॉलिसी' एक बार फिर विवादों के घेरे में आती दिख रही है। इसे अब उसी नजर से देखा जा रहा है जिस तरह पूर्व में लाए गए केंद्र के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को देखा गया था, जिन्हें भारी विरोध के बाद वापस लेना पड़ा था। मुख्यमंत्री भगवंत मान जहाँ इस नीति को किसानों के हित में बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि यह उन्हें ज़मीन बेचने के बजाय संपत्ति का मालिक बनाएगी, वहीं किसान संगठन इसमें अपनी भविष्य की असुरक्षा देख रहे हैं।

मुख्यमंत्री मान का तर्क है कि जब सरकारें विकास परियोजनाओं जैसे औद्योगिक इकाइयाँ या बुनियादी ढाँचा खड़ा करने के लिए किसानों की ज़मीन अधिग्रहित करती हैं, तो नकद मुआवज़ा अक्सर जल्द ही खर्च हो जाता है, जिससे किसान अगली पीढ़ी तक ज़मीन विहीन हो जाते हैं। उनकी नई नीति इसी समस्या का समाधान बताती है; इसके तहत सरकार किसान को नकद मुआवजे की बजाय उनकी ज़मीन के एक तय अनुपात (जैसे प्रति एकड़ एक चौथाई या पाँचवे हिस्से) में विकसित प्लॉट (आवासीय या वाणिज्यिक) देगी। मान का यह भी कहना है कि किसान तुरंत इन प्लॉटों को बेचने के बजाय उनका उपयोग खुद के व्यवसाय या आय के लिए करें, जिससे वे लंबे समय तक आर्थिक रूप से सुरक्षित रहें।

हालाँकि, संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) समेत विभिन्न किसान संगठन इस नीति से चिंतित हैं। उनका मानना है कि यह नीति किसानों को अंततः उनकी कृषि योग्य ज़मीन से वंचित कर देगी और उन्हें भूमिहीन बना देगी। किसान नेताओं का कहना है कि पूर्व में मोहाली या लुधियाना जैसे शहरों के विकास के दौरान भी किसानों से ज़मीनें ली गईं, लेकिन मुआवज़े से कुछ समय बाद उनके पास कुछ नहीं बचा और वे 'भूमिहीन' बन गए। किसानों को आशंका है कि यह नीति कहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े उद्योगपतियों को भूमि नियंत्रण सौंपने का एक नया रास्ता न हो। वे इसे उस तरह की ही ज़मीन हड़पने की कोशिश मानते हैं, जिस तरह का खतरा उन्होंने तीन कृषि कानूनों में देखा था।

सरकार की ओर से भले ही इसे एक स्वैच्छिक नीति बताया जा रहा हो, लेकिन किसान संगठनों का डर है कि सरकार के दबाव और परियोजनाओं के नाम पर किसानों को मजबूरन इसमें शामिल होना पड़ सकता है। उन्हें डर है कि विकसित प्लॉट देने की आड़ में आखिर में उनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं बचेगी और वे शहरी क्षेत्रों में सिर्फ प्लॉट मालिक बनकर रह जाएँगे, जबकि उनकी आजीविका पूरी तरह कृषि से चलती है।

यह स्थिति फिर से पंजाब में बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन की जमीन तैयार कर सकती है, खासकर तब जब किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर कृषि कानूनों के विरोध में अपनी ज़बरदस्त लड़ाई की याद ताज़ा है। इस नीति पर सरकार और किसानों के बीच तकरार आगे और बढ़ने की उम्मीद है।

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