जहर पिलाने आई पूतना को भगवान कृष्ण ने क्यों दिया मां का उच्च स्थान? जानिए श्रीमद्भागवत का अद्भुत रहस्य
सनातन धर्म और पौराणिक कथाओं में भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का हर एक प्रसंग गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश समेटे हुए है। जब भी हम कान्हा के बालपन के प्रसंगों का स्मरण करते हैं, तो पूतना राक्षसी का वध हमारी स्मृति में स्वतः आ जाता है। कंस के दुष्ट आदेश पर गोकुल आई इस क्रूर राक्षसी का वध भगवान श्री कृष्ण ने किया था, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने उसे ऐसा उच्च स्थान प्रदान किया जो बड़े-बड़े योगियों और ऋषियों को भी दुर्लभ होता है। यह सवाल अक्सर श्रद्धालुओं के मन में उठता है कि जो राक्षसी बालकृष्ण को विष पिलाकर मारने आई थी, उसे प्रभु ने मां का स्थान और मोक्ष क्यों दिया। श्रीमद्भागवत महापुराण में इस अद्भुत और रहस्यमयी प्रसंग का बहुत ही सुंदर और तार्किक वर्णन मिलता है, जो मानव मन के भावों और भगवान की अतुट करुणा को उजागर करता है।
कौन थी पूतना और क्या था उसका पूर्व जन्म का रहस्य
पूतना वध की कथा को गहराई से समझने के लिए हमें इसके पूर्व जन्म के प्रसंग में जाना पड़ता है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, यह क्रूर राक्षसी अपने पूर्व जन्म में दैत्यराज और भक्त प्रहलाद के पोते राजा बलि की पुत्री हुआ करती थी, और उसका नाम रत्नमाला था। त्रेता युग या उससे पूर्व जब भगवान विष्णु ने त्रयोदशी के दिन 'वामन अवतार' धारण किया था और राजा बलि के यज्ञ में भिक्षा मांगने पहुंचे थे, तब उस छोटे से ब्राह्मण बालक रूपी भगवान को देखकर राजकुमारी रत्नमाला मंत्रमुग्ध हो गई थी। उसके मन में वात्सल्य भाव जाग उठा था और उसने विचार किया था कि यदि यह सुंदर और अलौकिक बालक उसका पुत्र होता, तो वह उसे बड़े प्रेम से स्तनपान कराती।
हालांकि, इसके ठीक विपरीत जब वामन देव ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगकर उनके अहंकार को तोड़ा और पूरे ब्रह्मांड को दो पगों में नापते हुए बलि को पाताल लोक में भेज दिया, तब उसी रत्नमाला के मन में परमेश्वर के प्रति अत्यधिक क्रोध और प्रतिशोध की भावना भी उत्पन्न हो गई। उस समय उसके मन में दूसरा विचार यह आया कि 'यदि यह बालक मेरा पुत्र होता, तो मैं इसे विष देकर मार डालती।' भगवान की लीला देखिए कि उसने रत्नमाला के दोनों ही संकल्पों—वात्सल्य और विषपान कराने की इच्छा—को स्वीकार करते हुए 'तथास्तु' कह दिया था। वही रत्नमाला द्वापर युग में कंस की दासी और पूतना राक्षसी के रूप में जन्मी, ताकि भगवान अपने द्वारा दिए गए वचन और संकल्प को पूरा कर सकें।
श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित पूतना वध का संपूर्ण प्रसंग
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूतना के उद्धार और वध की यह पावन कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के छठे अध्याय में विस्तार से वर्णित है। उस समय मथुरा के सिंहासन पर कंस बैठा हुआ था, जो देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान के हाथों अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी से भयभीत था। कंस ने अपनी बहन के जन्म लेने वाले सभी बालकों को मौत के घाट उतार दिया था, लेकिन योगमाया और भगवान की दिव्य शक्ति से कान्हा सुरक्षित रूप से गोकुल में नंद बाबा के यहां पहुंचा दिए गए थे। जब कंस को यह गुप्त सूचना मिली कि देवकी का वह काल जीवित है और गोकुल में पल रहा है, तब उसने अपनी सबसे शक्तिशाली, कपटी और मायावी राक्षसी पूतना को गोकुल में जाकर सभी नवजात शिशुओं और विशेषकर कृष्ण का वध करने का गुप्त आदेश दिया।
पूतना के पास यह असीम शक्ति थी कि वह आकाश में अपनी इच्छा से उड़ सकती थी और कोई भी सुंदर रूप धारण कर सकती थी। गोकुल पहुंचते ही उसने एक अत्यंत सुंदर, मनमोहक और सुडौल युवती का रूप बना लिया, जिसके बालों में सुगंधित फूल सजे हुए थे और शरीर पर उत्तम वस्त्र थे। ब्रज की गलियों में घूमते हुए उसने बच्चों की तलाश की और अंततः माता यशोदा के आंगन में प्रवेश कर गई। बाहर से उसका रूप इतना सौम्य और शांत था कि किसी को भी उस पर संदेह नहीं हुआ। उसने बालक कृष्ण को अपनी गोद में उठाया और उन्हें अपना विषैला स्तनपान कराने लगी, ताकि वह अपने दुष्ट उद्देश्य को पूरा कर सके।
भगवान कृष्ण ने क्यों दिया पूतना को मां का उच्च स्थान और मोक्ष?
यह इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण और दार्शनिक पहलू है। जब पूतना श्री कृष्ण को अपना विषयुक्त दूध पिलाने लगी, तो भगवान ने उसके कपट और जहर को तो दूर कर दिया, बल्कि उसके भीतर छिपे उस मार्मिक भाव को स्वीकार कर लिया जो उसने पूर्व जन्म में 'माता' के रूप में सोचा था। भगवान की नजर मनुष्य की बाहरी दुष्टता या नीयत से ज्यादा उसके द्वारा अर्पित किए गए समर्पण और भाव पर होती है। पूतना ने भले ही मारने के दुर्भाव से उसे स्तनपान कराया हो, लेकिन उसने अपने स्तन से वह अमृत रूपी दूध (और साथ में प्राण) भगवान को समर्पित कर दिया, जो एक मां अपने बच्चे को देती है।
कृष्ण ने उसे मातृत्व का वही भाव प्रदान किया जिसके लिए वह पूर्व जन्म में तरसी थी। जब पूतना ने श्री कृष्ण को दूध पिलाना शुरू किया, तो उस बाल गोपाल के स्पर्श मात्र से उसके शरीर का सारा विष और पाप नष्ट होने लगा। कन्हा ने उसके प्राणों को खींचते हुए उसे ऐसा असहनीय दर्द दिया कि वह अपना मायावी रूप छिपा नहीं सकी और अपने विशाल राक्षसी स्वरूप में आ गई। गोकुल की सीमा से बाहर खेतों में गिरकर उसका अंत हुआ। लेकिन भगवान की यह कृपा देखिए कि जिस राक्षसी का आगमन बच्चों को मारने के लिए हुआ था, उसे प्रभु ने अपनी शरण में लेकर अपने धड़ से लगाया और उसे 'माता' का दर्जा देते हुए बैकुंठधाम का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इससे यह संदेश मिलता है कि प्रभु की शरण में आने वाले के पूर्वकृत समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और सच्चा भाव ही भगवान को रिझाने का एकमात्र साधन है।