पितरों को समर्पित दर्श अमावस्या कब है सितंबर 2026 में? पूर्वजों का आशीर्वाद पाने और पितृ दोष दूर करने के लिए जरूर करें ये 4 विशेष काम

पितरों को समर्पित दर्श अमावस्या कब है सितंबर 2026 में? पूर्वजों का आशीर्वाद पाने और पितृ दोष दूर करने के लिए जरूर करें ये 4 विशेष काम

सनातन हिंदू धर्म और संस्कृति में पंचांग के अनुसार आने वाली हर एक तिथि का अपना एक विशिष्ट आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व होता है, लेकिन जब बात हमारे पूर्वजों, पितरों और उनकी शांति की आती है, तो अमावस्या तिथि का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। वर्ष भर में आने वाली तमाम अमावस्या तिथियों में 'दर्श अमावस्या' का दिन बेहद पवित्र और फलदायी माना गया है, जिसे विशेष तौर पर पितरों की तृप्ति, उनकी कृपा प्राप्ति और मोक्ष की कामना के लिए समर्पित किया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में पित्र दोष या किसी अन्य प्रकार का पितृ ऋण विद्यमान है, जिसके कारण उसके जीवन में लगातार बाधाएं आ रही हैं, तो उसे दर्श अमावस्या के इस पावन अवसर पर विधि-विधान से कुछ अचूक उपाय अवश्य करने चाहिए। सितंबर के महीने में आने वाली इस महत्वपूर्ण तिथि को लेकर सनातन प्रेमियों के मन में तमाम तरह की जिज्ञासाएं हैं कि यह व्रत या पर्व कब मनाया जाएगा और इस दिन ऐसा क्या किया जाए जिससे अप्रसन्न पूर्वज शांत होकर अपने पूरे परिवार पर सुख-समृद्धि की बौछार कर सकें। जीवन में आ रही समस्त प्रकार की अड़चनों को दूर करने और पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए दर्श अमावस्या का यह दिन किसी वरदान से कम नहीं है, बशर्ते इसे पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ मनाया जाए।

सितंबर 2026 में कब है दर्श अमावस्या? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पंचांग की गणना

हिंदू पंचांग और खगोलीय गणनाओं के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली अमावस्या तिथि को दर्श अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष यानी 2026 में सितंबर महीने में पड़ने वाली यह अत्यंत महत्वपूर्ण दर्श अमावस्या आगामी 10 सितंबर 2026, गुरुवार के दिन आ रही है। वैदिक पंचांग के नियमों के तहत दर्श अमावस्या तिथि का आरंभ 10 सितंबर को सुबह के समय होगा और इसका समापन अगले दिन यानी 11 सितंबर 2026 को सुबह 8:56 बजे तक होगा। चूंकि सनातन धर्म में उदया तिथि का विशेष महत्व माना जाता है, इसलिए उदया तिथि के कड़े नियमों का पालन करते हुए मुख्य रूप से 10 सितंबर, गुरुवार को ही दर्श अमावस्या का व्रत और पूजन अनुष्ठान किया जाएगा। इस दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदियों में स्नान करने या घर पर ही गंगा जल मिले पानी से स्नान करने के बाद पितरों के निमित्त पूजा-पाठ करने का विधान है। पंचांग के इन सटीक और पुख्ता Muhurat के अनुसार यदि कोई जातक सही समय पर अनुष्ठान करता है, तो उसे अपनी पूजा का शत-प्रतिशत सकारात्मक फल प्राप्त होता है और पूर्वजों की असीम अनुकंपा उसके पूरे परिवार पर सदैव बनी रहती है।

पितरों की आत्मा की शांति के लिए जल में काले तिल मिलाकर करें विशेष तर्पण

दर्श अमावस्या के पावन अवसर पर पूर्वजों के निमित्त तर्पण करना सबसे मुख्य और अनिवार्य धार्मिक कार्य माना जाता है। ऐसी अटूट मान्यता है कि यदि आप इस विशेष दिन पर अपने दिवंगत पूर्वजों और पितरों के नाम से सच्चे मन से तर्पण करते हैं, तो उनकी भटकती हुई आत्मा को परम् शांति और तृप्ति मिलती है, जिससे वे प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। इस दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर किसी पवित्र नदी के तट पर या अपने घर के पूजा स्थल पर तांबे के लोटे में शुद्ध जल लें और उसमें काले तिल तथा सफेद फूल अवश्य मिलाएं। इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल अर्पित करें। यदि आप किसी पवित्र नदी में स्नान करने के बाद विधि-विधान से यह तर्पण कर्म करते हैं, तो इसका पुण्य कई गुना अधिक बढ़ जाता है। काले तिल का संबंध सीधे तौर पर शनि और राहु के दुष्प्रभावों को शांत करने के साथ-साथ पितरों की संतुष्टि से भी जोड़ा गया है, इसलिए तर्पण में काले तिल का प्रयोग करना कभी नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि यह पितृ दोष के निवारण का एक अचूक और पारंपरिक माध्यम माना गया है।

पीपल के वृक्ष की पूजा और दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर पितरों को करें प्रसन्न

सनातन संस्कृति में पीपल के पेड़ को सामान्य वृक्ष नहीं बल्कि साक्षात देवताओं और विशेषकर पूर्वजों का वास स्थान माना गया है। दर्श अमावस्या के दिन सुबह स्नान करने के बाद पीपल के पेड़ के पास जाएं और उसकी जड़ में जल अर्पित करते हुए शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें, ऐसा करने से जीवन में आ रही समस्त प्रकार की बाधाएं और रुकावटें स्वतः दूर होने लगती हैं। इसके अलावा, वास्तु शास्त्र और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार दक्षिण दिशा को सीधे तौर पर यमराज और पितरों की दिशा माना गया है। दर्श अमावस्या की संध्या के समय अपने घर की दक्षिण दिशा में सरसों के तेल या शुद्ध घी का एक मुखी दीपक अवश्य जलाएं और मन ही मन अपने पूर्वजों से अपने परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें। ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं और घर से नकारात्मक ऊर्जा हमेशा के लिए दूर हो जाती है। इसके साथ ही, दर्श अमावस्या के दिन आसमान में भले ही चंद्रमा दिखाई न दे, क्योंकि यह अमावस्या की रात होती है, लेकिन चंद्रोदय की सही दिशा में देखकर चंद्रमा को अर्घ्य अवश्य देना चाहिए, क्योंकि चंद्रमा की पूजा करने से भी पूर्वजों की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है और जीवन में मानसिक शांति तथा खुशहाली का आगमन होता है।