दीवाली पर शाम को छूट गया लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त? न हों परेशान
सनातन परंपरा में प्रकाश और समृद्धि का महापर्व दीपावली पूरे देश और दुनिया में अत्यंत हर्षोल्लास, अटूट श्रद्धा और उमंग के साथ मनाया जा रहा है। कार्तिक मास की पावन अमावस्या तिथि पर धन-धान्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी और रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश के पूजन का विधान अनादि काल से चला आ रहा है। लोग अपने घरों, प्रतिष्ठानों और कार्यस्थलों को रंग-बिरंगी रोशनी, तोरण, रंगोली और पारंपरिक मिट्टी के दीयों से सजाकर मां लक्ष्मी के आगमन का स्वागत करते हैं। शास्त्रों के अनुसार दीवाली की शाम को प्रदोष काल और स्थिर लग्न में महालक्ष्मी की पूजा करने से परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और अखंड ऐश्वर्य का वास होता है।
हालांकि, कई बार दीवाली की आपाधापी, बाजार से अंतिम समय की खरीदारी, रिश्तेदारों व मित्रों से मिलने-जुलने, कार्यालयीन जिम्मेदारियों या यात्रा में देरी के चलते कई श्रद्धालु शाम के निर्धारित मुख्य मुहूर्त में पूजा संपन्न नहीं कर पाते। ऐसे में मन में ग्लानि, अपराधबोध और अफसोस की भावना घर कर जाती है कि साल के सबसे बड़े पर्व का शुभ मुहूर्त हाथ से निकल गया। यदि आपके साथ भी किसी कारणवश ऐसा हुआ है और आप शाम के समय मां लक्ष्मी और गणेश जी की आराधना नहीं कर सके हैं, तो तनिक भी निराश या चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। धर्मशास्त्रों और वैदिक पंचांग में इस स्थिति का एक अत्यंत श्रेष्ठ और मंगलकारी विकल्प प्रदान किया गया है, जिसके माध्यम से आप देर रात भी पूरी श्रद्धा से पूजा कर संपूर्ण शुभ फल प्राप्त कर सकते हैं।
निशीथ काल की असीम महिमा: जानिए देर रात 11:38 से 12:31 बजे तक का सबसे मंगलकारी समय
वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, दीपावली की पूरी रात अपने आप में एक 'सिद्ध रात्रि' या 'कालरात्रि' मानी गई है। इस रात का एक-एक पल ब्रह्मांडीय ऊर्जा से सराबोर रहता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि यदि कोई गृहस्थ संध्या के समय प्रदोष काल में पूजन न कर पाए, तो वह मध्यरात्रि में 'निशीथ काल' के दौरान महालक्ष्मी की विधिवत आराधना कर सकता है। निशीथ काल को शास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ, गोपनीय और त्वरित फलदायी माना जाता है। तंत्र शास्त्र, मंत्र साधना और यंत्र सिद्धि के अभ्यासी तो विशेष रूप से इसी काल की प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि इस समय वातावरण में तमोगुण शांत हो जाता है और सकारात्मक ऊर्जाएं अपने चरम पर होती हैं।
पंचांगीय गणना के अनुसार, 8 नवंबर 2026 की रात को निशीथ काल का अत्यंत शुभ मुहूर्त रात 11 बजकर 38 मिनट से प्रारंभ होगा और यह मध्यरात्रि के बाद यानी 9 नवंबर की सुबह 12 बजकर 31 मिनट तक बना रहेगा। इस प्रकार श्रद्धालुओं को मध्यरात्रि में मां लक्ष्मी की विशेष साधना और पूजन के लिए लगभग 53 मिनट की एक अत्यंत पवित्र समयावधि प्राप्त होगी। इस पावन समय में शांत मन, एकाग्र चित्त और पवित्र भाव से जो भी जातक माता लक्ष्मी के बीज मंत्रों, श्रीसूक्त या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करता है, उसे शाम की पूजा के समान ही बल्कि कई गुना अधिक गहरा आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।
शाम के मुख्य मुहूर्त और प्रदोष काल का समय: क्या था पंचांगीय आंकड़ा
दीवाली के दिन समय की गणना का बहुत महत्व होता है। जो श्रद्धालु समय पर पूजा कर पाए, उनके लिए शाम को प्रदोष काल का समय शाम 5 बजकर 31 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 09 मिनट तक निर्धारित था। इसी समयावधि के भीतर शाम को 5 बजकर 54 मिनट से लेकर रात 7 बजकर 50 मिनट तक स्थिर लग्न यानी 'वृषभ काल' का सबसे मुख्य और शुभ मुहूर्त विद्यमान था। शास्त्रों में वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है, जिसका अर्थ है कि इस लग्न में की गई लक्ष्मी पूजा से धन और संपदा घर में स्थिर रूप से टिकती है और व्यर्थ के अपव्यय पर रोक लगती है।
लेकिन जिन लोगों से किसी कारणवश यह समय चूक गया है, उनके लिए निशीथ काल एक वरदान की तरह है। धर्मग्रंथों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि भक्ति में समय के साथ-साथ भाव की प्रधानता होती है। यदि शाम का स्थिर लग्न बीत भी गया हो, तो निशीथ काल में 'सिंह लग्न' का प्रभाव सक्रिय रहता है, जो शक्ति, साहस, विजय और आंतरिक ऐश्वर्य का प्रतीक माना गया है। इसलिए बिना किसी मानसिक तनाव के रात के इस शुभ मुहूर्त का सदुपयोग करना चाहिए।
मां लक्ष्मी के साथ श्री गणेश और कुबेर जी की त्रिमूर्ति पूजा: जाने बिना क्यों अधूरी रहती है आराधना
दीपावली के दिन केवल मां लक्ष्मी की अकेली पूजा करने का विधान शास्त्रों में वर्जित बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्रथम पूज्य भगवान गणेश को मां लक्ष्मी का दत्तक पुत्र माना गया है। जब मां लक्ष्मी ने अपने अहंकार से मुक्त होकर सृष्टि के संचालन में सद्बुद्धि का महत्व समझा, तब उन्होंने भगवान गणेश को अपने पुत्र रूप में स्वीकार किया और यह वरदान दिया कि जहां भी उनकी पूजा होगी, वहां सबसे पहले गणेश जी का पूजन अनिवार्य होगा। बिना बुद्धि, विवेक और विघ्नहर्ता गणेश के यदि केवल धन आता है, तो वह विनाश और पतन का कारण बन सकता है; इसलिए बुद्धि और धन का संतुलन बनाए रखने के लिए दोनों की संयुक्त पूजा की जाती है।
इसके साथ ही, दीपावली की रात धन के वास्तविक संरक्षक और कोषाध्यक्ष माने जाने वाले यक्षराज भगवान कुबेर की पूजा का भी विशेष महत्व है। मां लक्ष्मी धन की स्वामिनी हैं तो कुबेर जी उस धन का प्रबंधन और वितरण करते हैं। निशीथ काल में पूजा करते समय एक साफ चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां लक्ष्मी और गणेश जी की प्रतिमा के साथ-साथ कुबेर यंत्र या उनकी प्रतिमा भी स्थापित करें। सबसे पहले आचमन और पवित्रीकरण करें, इसके बाद गणेश जी को दूर्वा, रोली और मोदक अर्पित करें। तदुपरांत मां लक्ष्मी को कमल का फूल, कौड़ियां, कमलगट्टा, अक्षत और खीर-बताशे का भोग लगाएं। कुबेर देव का ध्यान करते हुए उन्हें सफेद मिठाई और पीले पुष्प चढ़ाएं। शुद्ध देसी घी का चौमुखी दीपक जलाकर 'ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः' अथवा महालक्ष्मी के बीज मंत्र 'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद' का शांत भाव से कम से कम 108 बार जप करें। इस प्रकार मध्यरात्रि में किया गया यह सरल और भावपूर्ण अनुष्ठान आपके जीवन के समस्त आर्थिक संकटों और दोषों को समूल नष्ट कर सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगा।