बिहार से हुआ लाल आतंक का सफाया भोजपुर से जमुई तक अब नहीं गूंजती बंदूकें ,जानें कैसे नक्सल मुक्त

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News India Live, Digital Desk: बिहार, जो कभी देश के 'रेड कॉरिडोर' (Red Corridor) का मुख्य केंद्र माना जाता था, अब नक्सलवाद के काले साये से पूरी तरह बाहर आ चुका है। भोजपुर, गया, जहानाबाद और रोहतास जैसे जिले, जहाँ कभी नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती थी, अब विकास की मुख्यधारा से जुड़ गए हैं।

1. इन जिलों में था सबसे ज्यादा प्रभाव

नक्सलवाद की जड़ें बिहार के कई जिलों में बेहद गहरी थीं। सुरक्षा बलों के निरंतर अभियानों ने इन क्षेत्रों को मुक्त कराया है:

भोजपुर और जहानाबाद: यहाँ जातीय संघर्ष और नक्सली हिंसा का लंबा इतिहास रहा है।

गया और औरंगाबाद: इन पहाड़ी क्षेत्रों को नक्सलियों का 'सुरक्षित किला' माना जाता था (जैसे छकरबंधा और लुटुआ के जंगल)।

जमुई और रोहतास: झारखंड की सीमा से सटे होने के कारण यहाँ नक्सलियों की आवाजाही सबसे अधिक थी।

2. कैसे मिली यह बड़ी जीत? (Operation 'Double Bull' & Others)

सुरक्षा बलों और बिहार पुलिस की साझा रणनीति ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी:

सुरक्षा बलों की तैनाती: CRPF, कोबरा (CoBRA) बटालियन और बिहार पुलिस ने दुर्गम इलाकों में नए 'फॉरवर्ड बेस' बनाए।

ऑपरेशन डबल बुल: हाल के वर्षों में चलाए गए इस ऑपरेशन ने औरंगाबाद और गया के पहाड़ी इलाकों से नक्सलियों का सफाया कर दिया।

आत्मसमर्पण नीति: सरकार की 'सरेंडर और पुनर्वास' नीति के कारण कई बड़े इनामी नक्सलियों ने हथियार डाल दिए।

3. विकास बना सबसे बड़ा हथियार

सिर्फ गोलियों से नहीं, बल्कि विकास के जरिए भी इस जंग को जीता गया:

सड़क और बिजली: नक्सल प्रभावित गांवों तक पक्की सड़कें और बिजली पहुँचने से नक्सलियों का सूचना तंत्र कमजोर हुआ।

शिक्षा और रोजगार: युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कौशल विकास और शिक्षा पर जोर दिया गया, जिससे वे 'लाल आतंक' के बहकावे में न आएं।

अब आगे क्या?

हालांकि बिहार को अब नक्सल मुक्त माना जा रहा है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां अभी भी 'स्लीपर सेल्स' और सीमावर्ती क्षेत्रों में चौकसी बरत रही हैं ताकि ये तत्व फिर से सिर न उठा सकें। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे बिहार की 'दूसरी आजादी' की तरह बताया है, जो राज्य में निवेश और पर्यटन के नए द्वार खोलेगी।