Ranchi Municipal Corporation Election : ओबीसी प्रत्याशियों की राह में रोड़ा बना 1978 का खतियान, दर्जनों दावेदार रेस से बाहर
News India Live, Digital Desk : रांची नगर निगम चुनाव की सरगर्मी के बीच ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) के लिए आरक्षित वार्डों में एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित 13 वार्डों में पार्षद पद के दावेदारों की उम्मीदों पर 'जाति प्रमाण पत्र' (Caste Certificate) के कड़े नियमों ने पानी फेर दिया है।
अनेक संभावित प्रत्याशी महीनों की मेहनत के बाद अब चुनाव लड़ने की पात्रता खोते नजर आ रहे हैं, क्योंकि उनके पास वर्ष 1978 से पहले की जमीन के कागजात उपलब्ध नहीं हैं।
क्यों मुश्किल हुआ जाति प्रमाण पत्र बनाना?
झारखंड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग के नियमों के अनुसार, गैर-शैक्षणिक कार्यों (जैसे चुनाव लड़ना) के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाने हेतु 1978 या उससे पहले की जमीन का डीड (खतियान) होना अनिवार्य है।
बाहरी आबादी पर असर: रांची में बिहार और अन्य राज्यों से आकर बसे लोगों की संख्या काफी अधिक है। इनमें से अधिकांश लोग 30-40 साल से यहां रह रहे हैं, लेकिन उनके पास 1978 से पहले के स्थानीय कागजात नहीं हैं।
किरायेदारों का संकट: कई ऐसे दावेदार हैं जो आरक्षित वार्डों में दशकों से रह रहे हैं, लेकिन अपनी जमीन न होने के कारण वे प्रमाण पत्र से वंचित रह गए हैं।
जानकारी का अभाव: वार्ड समिति के माध्यम से या स्थानीय जांच के आधार पर प्रमाण पत्र बनवाने की वैकल्पिक प्रक्रियाओं की जानकारी न होने की वजह से भी कई लोग आवेदन नहीं कर पाए।
वार्डों का गणित: कहां-कहां है आरक्षण?
रांची नगर निगम के कुल 53 वार्डों में से 13 वार्ड ओबीसी के लिए आरक्षित हैं:
| श्रेणी | आरक्षित सीटों की संख्या | वार्ड संख्या |
|---|---|---|
| अत्यंत पिछड़ा वर्ग (Annexure-1) | 09 | 11, 15, 16, 17, 21, 22, 23, 38 और 49 |
| पिछड़ा वर्ग (Annexure-2) | 04 | 20, 26, 27 और 28 |
पुराने सर्टिफिकेट पर असमंजस बरकरार
एक बड़ी चुनौती उन प्रत्याशियों के सामने भी है जिनके पास पुराने (मैन्युअल) प्रमाण पत्र हैं।
2019 की गाइडलाइन: सरकार ने 2019 में विस्तृत गाइडलाइन जारी की थी, जिसमें जमीन के मालिकाना हक को अनिवार्य किया गया है।
मैन्युअल vs डिजिटल: वर्ष 2008 के चुनाव में कई पार्षदों ने हाथ से बने (मैन्युअल) प्रमाण पत्र लगाए थे। अब 2013 से प्रक्रिया ऑनलाइन हो चुकी है।
अधिकारियों की चुप्पी: पुराना मैन्युअल प्रमाण पत्र इस चुनाव में मान्य होगा या नहीं, इस पर नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारी स्पष्ट जवाब देने से बच रहे हैं।दावेदारों की पीड़ा: "हम 30 साल से वार्ड की सेवा कर रहे हैं, लेकिन 1978 के कागजात नहीं होने के कारण हमारा लोकतांत्रिक अधिकार छीना जा रहा है।" एक संभावित प्रत्याशी