राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम की अनिवार्यता पर मौलाना मदनी का बड़ा बयान,धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर छिड़ी नई बहस

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News India Live, Digital Desk: भारत में राष्ट्रभक्ति के प्रतीकों को लेकर एक बार फिर वैचारिक जंग तेज हो गई है। हालिया विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ राज्यों और संस्थानों में राष्ट्रगान (National Anthem) से पहले वंदे मातरम (Vande Mataram) के सभी छह अंतरा (Stanzas) को गाने या अनिवार्य करने का सुझाव सामने आया। इस पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार बताया है।

1. मौलाना मदनी की मुख्य आपत्तियां (Religious Freedom Row)

मौलाना मदनी ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ हर नागरिक को अपने धर्म के अनुसार जीने का अधिकार है।

ईश्वर और वंदना: मदनी का तर्क है कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और की वंदना (पूजा के समान सम्मान) करना जायज नहीं है। वंदे मातरम के कुछ अंतरा (Stanzas) में धरती को देवी के रूप में संबोधित किया गया है, जो मुस्लिम मान्यताओं के साथ विरोधाभास पैदा करता है।

जबरन थोपना: उन्होंने स्पष्ट किया कि हम वतन (देश) से मोहब्बत करते हैं और राष्ट्रगान का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक गीत को अनिवार्य करना संविधान के खिलाफ है।

2. राष्ट्रगान और वंदे मातरम का प्रोटोकॉल

विवाद का एक बड़ा हिस्सा इसके ऐतिहासिक और कानूनी प्रोटोकॉल से जुड़ा है। भारत के संविधान और कानूनों के अनुसार दोनों का अपना महत्व है:

मानकजन गण मन (राष्ट्रगान)वंदे मातरम (राष्ट्रगीत)
दर्जासंवैधानिक रूप से सर्वोच्चराष्ट्रगान के बराबर सम्मान प्राप्त
रचयितारबींद्रनाथ टैगोरबंकिम चंद्र चटर्जी
अनिवार्यतासरकारी आयोजनों में अनिवार्यसम्मान जरूरी, पर बाध्यता पर कानूनी स्पष्टता का अभाव

3. 'छह अंतरा' (Six Stanzas) का मुद्दा क्या है?

आमतौर पर वंदे मातरम का केवल पहला अंतरा ही आधिकारिक कार्यक्रमों में गाया जाता है। विवाद तब बढ़ा जब यह मांग उठी कि इसके पूरे छह अंतरा गाए जाने चाहिए। आलोचकों का कहना है कि बाद के अंतराओं में धार्मिक प्रतीकों का अधिक उपयोग हुआ है, जिसे लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में आपत्ति है।

4. सरकार और समर्थक गुट का पक्ष

वहीं, वंदे मातरम के समर्थकों का कहना है कि यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत था। उनके अनुसार:

वंदे मातरम किसी धर्म विशेष का नहीं बल्कि 'राष्ट्र भक्ति' का गीत है।

देश को 'माता' मानना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है और इसे मजहबी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।