राजस्थान में विजयादशमी पर रावण दहन का उल्लास और परंपरा

राजस्थान में विजयादशमी पर रावण दहन का उल्लास और परंपरा

सनातन संस्कृति के सबसे बड़े और प्रमुख पर्वों में से एक विजयादशमी यानी दशहरा देश भर में बेहद धूमधाम के साथ मनाया जाता है। बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक इस पावन पर्व पर हर साल की तरह इस बार भी राजस्थान के कोने-कोने में भव्य रावण दहन के कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। रेगिस्तानी संस्कृति और ऐतिहासिक रजवाड़ों की धरती राजस्थान में दशहरे का उत्साह हमेशा से ही अनूठा और देखने लायक होता है। राज्य के प्रमुख शहरों जैसे जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर और उदयपुर में विशालकाय पुतलों के निर्माण और उनके दहन को देखने के लिए लाखों की संख्या में आम लोग सड़कों और मेलों के मैदानों में जुटते हैं। हर कोई यह जानना चाहता है कि उनके शहर में रावण दहन का सही समय क्या रहेगा और किस स्थान पर सबसे भव्य आयोजन देखने को मिलेगा।

राजधानी जयपुर में प्रमुख स्थानों पर रावण दहन का समय

गुलाबी नगरी जयपुर में दशहरे के पर्व पर कई बड़े और ऐतिहासिक मैदानों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के ऊंचे पुतले जलाए जाते हैं। जयपुर के आदर्श नगर स्थित दशहरा मैदान, विद्याधर नगर स्टेडियम, मानसरोवर और हवा सड़क मैदान पर हर साल की तरह इस बार भी विशाल मेलों का आयोजन किया गया है। पंचांग और स्थानीय आयोजन समितियों के अनुसार जयपुर में रावण दहन का मुख्य मुहूर्त शाम को लगभग 5:30 बजे से 7:30 बजे के बीच का तय किया गया है। शाम ढलते ही जैसे ही प्रदोष काल शुरू होता है, वैसे ही आतिशबाजी और जय श्रीराम के जयकारों के साथ रावण के पुतले को आग के हवाले किया जाता है। सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए जयपुर पुलिस कमिश्नरेट द्वारा सभी प्रमुख स्थलों पर भारी पुलिस बल और ट्रैफिक डायवर्जन की पुख्ता व्यवस्था की गई है।

कोटा का ऐतिहासिक राष्ट्रीय दशहरा मेला और 105 फीट ऊंचा रावण

जब भी राजस्थान में दशहरे की बात आती है, तो कोटा के राष्ट्रीय दशहरा मेले का नाम सबसे पहले लिया जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी पहुंचते हैं। कोटा के प्रसिद्ध दशहरा मैदान में हर साल की तरह इस बार भी ऐतिहासिक आयोजन हो रहा है, जहां इस साल 105 फीट से अधिक ऊंचे और अत्याधुनिक विशेषताओं से लैस रावण के पुतले का निर्माण किया गया है। कोटा की परंपरा के अनुसार शाम 5 बजे गढ़ पैलेस से श्री लक्ष्मीनारायण जी की भव्य शाही सवारी निकलती है, जो शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए दशहरा मैदान पहुंचती है। शाही सवारी के मैदान में पहुंचने और पारंपरिक पूजन संपन्न होने के बाद ही मुख्य रावण दहन की प्रक्रिया शुरू होती है। यहां रात के वक्त होने वाली भव्य आतिशबाजी देखने लायक होती है, जिसे देखने के लिए लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है।

जोधपुर और उदयपुर में भी दिखती है शाही संस्कृति की झलक

अपनी प्राचीन संस्कृति और किलों के लिए मशहूर जोधपुर शहर में भी रावण दहन के आयोजन बेहद भव्य रूप में होते हैं। जोधपुर के रावण चबूतरा मैदान और अन्य चुनिंदा स्थानों पर पुतला दहन देखने के लिए भारी जनसैलाब एकत्र होता है। जोधपुर में भी शाम को प्रदोष काल के दौरान लगभग 6:00 बजे के आसपास रावण दहन के कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं। इसी तरह मेवाड़ की ऐतिहासिक नगरी उदयपुर में गांधी ग्राउंड और शहर के अन्य खेल मैदानों पर बुराई के प्रतीक रूप में पुतले फूंके जाते हैं। स्थानीय प्रशासन और नगर निगम द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाते हैं ताकि परिवार के साथ मेला देखने आने वाले लोगों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।

मेला स्थलों पर सुरक्षा और यातायात के विशेष इंतजाम

विजयादशमी के मौके पर जुटने वाली भारी भीड़ को नियंत्रित करना प्रशासन के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहता है। इसे ध्यान में रखते हुए राजस्थान के सभी प्रमुख जिलों में जिला प्रशासन और पुलिस विभाग पूरी तरह से मुस्तैद नजर आ रहा है। यातायात को सुचारू बनाए रखने के लिए मेला स्थलों के आसपास के मार्गों को नो-विकल जोन घोषित किया गया है और वाहनों के लिए की गई पार्किंग व्यवस्था को अलग से तय किया गया है। प्रशासन ने आम जनता से अपील की है कि वे समय से पहले पहुंचें, बच्चों का विशेष ध्यान रखें और ट्रैफिक नियमों का पालन करें ताकि इस पावन पर्व का आनंद बिना किसी बाधा के उठाया जा सके।

असत्य पर सत्य की जीत का शाश्वत संदेश देता है यह पर्व

अंत में, रावण दहन का यह भव्य उत्सव केवल आतिशबाजी और मेलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें यह सिखाता है कि अहंकार, बुराई और अधर्म का अंत निश्चित होता है। राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व आपसी भाईचारे और उल्लास का संदेश देता है। चाहे आप जयपुर के मैदानों में हों या कोटा के ऐतिहासिक मेले का हिस्सा बन रहे हों, हर जगह का यह माहौल लोगों के दिलों में एक नया जोश भर देता है। समय पर अपने नजदीकी मैदान पहुंचकर इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनें और विजयादशमी के इस पवित्र पर्व को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाएं।