नकाबपोशों ने फूंका 1883 का ऐतिहासिक सिटी हॉल, 10 बड़े शहरों में मची भारी तबाही
यूरोपीय महाद्वीप के सबसे विकसित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देशों में शुमार फ्रांस इस समय आधुनिक इतिहास के सबसे गंभीर आंतरिक संकट और सुनियोजित हिंसा के दौर से गुजर रहा है। देश की राजधानी पेरिस समेत 10 प्रमुख शहरों में पिछले कुछ दिनों से आगजनी, बड़े पैमाने पर तोड़फोड़, सरकारी संपत्तियों के विध्वंस और दुकानों में खुली लूटपाट का ऐसा भयानक मंजर देखने को मिला है जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। बढ़ती कमरतोड़ महंगाई, जीवन यापन की भारी लागत (कॉस्ट ऑफ लिविंग क्राइसिस) और सरकारी स्कूलों की खस्ताहाल व्यवस्था के खिलाफ देश भर के आम नागरिकों, शिक्षकों, छात्रों और मजदूर यूनियनों ने सड़कों पर उतरकर एक बेहद अनुशासित और शांतिपूर्ण मार्च की शुरुआत की थी। 17 अक्टूबर को देश के विभिन्न प्रांतों में लगभग 5 लाख से अधिक आम नागरिक अपने बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर हाथों में तख्तियां लिए सड़कों पर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन जैसे ही सूरज ढला, प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ के बीच अचानक काले कपड़ों, ओवरसाइज्ड हूडी और चेहरों पर नकाब बांधे उपद्रवी गिरोहों की अप्रत्याशित एंट्री हुई। इन रहस्यमय और संगठित नकाबपोश समूहों ने चंद ही घंटों में शांतिपूर्ण जन-आंदोलन को हिंसक अराजकता, बर्बर लूटपाट और पुलिस के साथ खूनी संघर्ष में तब्दील कर दिया।
लिमोज का 1883 में बना ऐतिहासिक सिटी हॉल राख के ढेर में बदला, लियोन का टूरिस्ट ऑफिस भी फूंका
हिंसा पर आमादा इन नकाबपोश उपद्रवियों का मुख्य निशाना फ्रांस की ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत से जुड़ी सार्वजनिक इमारतें रहीं। सबसे दिल दहला देने वाली घटना मध्य-पश्चिमी फ्रांस के ऐतिहासिक शहर लिमोज (Limoges) में घटी। शनिवार को जब लिमोज में बढ़ती महंगाई के खिलाफ लगभग 5,500 आम लोग सड़कों पर शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे थे, तभी काली हूडी पहने चेहरे छुपाए दंगाइयों के एक उग्र झुंड ने सिटी हॉल के पूर्वी हिस्से पर पेट्रोल बमों से सुनियोजित हमला बोल दिया। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। तीन घंटे के भीतर ही वर्ष 1883 में पेरिस के प्रसिद्ध 'होटल डी विले' (Hôtel de Ville) की भव्य तर्ज पर निर्मित इस ऐतिहासिक सिटी हॉल की प्राचीन लकड़ी और धातु से बनी छत धू-धू कर जल उठी और पूरी तरह जलकर खाक हो गई। इसके अलावा बंदरगाह शहर मार्सिले (Marseille) के ऐतिहासिक सिटी हॉल के दरवाजे तोड़कर अंदर अराजक नारे और ग्राफिटी उकेरी गई, जबकि लियोन (Lyon) शहर के विश्व प्रसिद्ध टूरिस्ट इंफॉर्मेशन सेंटर को आग के हवाले कर दिया गया। पेरिस, बोर्डो, लिल और मार्सिले जैसे शहरों में लुटेरों ने लग्जरी फैशन बुटीक, अंतरराष्ट्रीय सुपरमार्केट्स और महंगे एप्पल (Apple) स्टोर्स के शीशे चकनाचूर कर करोड़ों यूरो के सामान पर हाथ साफ कर दिया।
आंखों में आंसू और दिल में गहरा आक्रोश: 'समझ नहीं आ रहा कि हमारे शहर को किसने और क्यों जलाया'
फ्रांस के प्रमुख समाचार पत्र 'ली मॉंडे' (Le Monde) द्वारा जारी ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, रविवार की अलसुबह सैकड़ों स्थानीय नागरिक, शोधकर्ता और छात्र अपनी आंखों से अपने शहर की 140 साल पुरानी स्थापत्य धरोहर के जले हुए खंडहर को देखने के लिए इमारत के सामने जमा हो गए। आंखों में आंसू लिए स्थानीय लोगों का दिल अपनी ही विरासत को राख में तब्दील देखकर दहल उठा था। मौके पर मौजूद 26 वर्षीय स्थानीय युवा यासीन ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि अपनी ही ऐतिहासिक इमारत को इस तरह खाक होते देखना बेहद घिनौना और शर्मनाक अनुभव है। वहीं साहित्य की 18 वर्षीया छात्रा मरीन की आंखों से आंसू छलक पड़े और उसने बेहद भावुक होकर कहा कि वह अंदर से टूट चुकी है और उसे समझ नहीं आ रहा कि स्कूलों और महंगाई की वाजिब लड़ाई लड़ते-लड़ते हालात इस बर्बरता तक कैसे पहुंच गए। रविवार की शाम को शहर के ऐतिहासिक 'प्लेस डे ला रिपब्लिक' (Place de la République) चौराहे पर हिंसा, आगजनी और नकाबपोशों की कायराना हरकत की सख्त निंदा करने के लिए एक विशाल शांति सभा बुलाई गई, जिसमें नगर निगम प्रशासन के अनुसार 7,000 से अधिक स्थानीय नागरिकों ने मोमबत्तियां जलाकर अपनी ऐतिहासिक धरोहर के प्रति एकजुटता प्रकट की।
1789 की फ्रांसीसी क्रांति से जुड़ी है धरोहर संरक्षण की जड़ें, 45 हजार प्राचीन इमारतों पर कड़ा पहरा
फ्रांस का आम जनमानस अपने इतिहास, स्मारकों और वास्तुकला की धरोहरों को लेकर दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में अत्यधिक संवेदनशील और सजग माना जाता है। फ्रांसीसी समाज में ऐतिहासिक इमारतों, प्राचीन चर्चों, नगर भवनों और कलाकृतियों को सहेजने की कानूनी और सामाजिक व्यवस्था सदियों पुरानी है। इस संरक्षण चेतना की ऐतिहासिक जड़ें वर्ष 1789 की विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी क्रांति से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उस ऐतिहासिक क्रांति के शुरुआती दौर में जब राजशाही के खिलाफ अंधाधुंध तोड़फोड़ और स्मारकों का नुकसान हुआ, तब प्रबुद्ध फ्रांसीसी विचारकों में अपनी राष्ट्रीय विरासत को हर हाल में सुरक्षित रखने की तीव्र चेतना जागी। इसी चेतना के परिणामस्वरूप वर्ष 1913 में फ्रांस में ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण का ऐतिहासिक कानून लागू हुआ, जिसने किसी भी प्राचीन इमारत को नष्ट करने, बेचने या उसके मूल स्वरूप को बदलने पर सख्त कानूनी रोक लगा दी। आज की तारीख में फ्रांस में लगभग 45,000 से अधिक ऐतिहासिक इमारतें और लाखों दुर्लभ कलाकृतियां राष्ट्रीय धरोहर के रूप में कानूनी सुरक्षा के तहत संरक्षित हैं। ऐसे देश में एक सदी से भी अधिक पुराने सिटी हॉल का इस तरह जल जाना हर फ्रांसीसी नागरिक की सांस्कृतिक अस्मिता पर सीधा कुठाराघात माना जा रहा है।
ब्लैक ब्लॉक रणनीति और हिंसक घुसपैठ: कैसे वाजिब जन-आंदोलनों की कमर तोड़ देती है अराजकता
समाजशास्त्रियों, सुरक्षा विश्लेषकों और यूरोपीय थिंक टैंक्स का मानना है कि फ्रांस में लंबे समय से 'ब्लैक ब्लॉक' (Black Bloc) जैसी चरमपंथी और अराजकतावादी रणनीति सक्रिय रही है। ये नकाबपोश तत्व न तो महंगाई के मुद्दे से कोई सरोकार रखते हैं और न ही स्कूलों की बेहतरी से; इनका एकमात्र मकसद भीड़ की आड़ लेकर सुरक्षा तंत्र को ध्वस्त करना, पुलिस पर हमले करना और बड़े पैमाने पर आर्थिक व भौतिक अराजकता फैलाना होता है। फ्रांस के प्रबुद्ध नागरिक और यूनियन नेता यह भली-भांति समझते हैं कि जैसे ही किसी लोकतांत्रिक प्रदर्शन में हिंसा और आगजनी शामिल होती है, सार्वजनिक विमर्श और मीडिया की हेडलाइन मुख्य मुद्दों जैसे घटती क्रय शक्ति और वेतन वृद्धि से पूरी तरह भटककर केवल आपराधिक घटनाओं और दंगों पर केंद्रित हो जाती है। यह हिंसक घुसपैठ सीधे तौर पर शांतिपूर्ण आंदोलनों की रीढ़ तोड़ देती है, क्योंकि कानून-व्यवस्था के बिगड़ने के बाद आम परिवार, महिलाएं और बुजुर्ग अपनी सुरक्षा के डर से विरोध प्रदर्शनों से किनारा कर लेते हैं, जिससे जन-आंदोलन की ताकत धीरे-धीरे बिखर जाती है।