सऊदी अरब में बांग्लादेशी कपल को 'ताजीर' में क्यों दी गई फांसी, जानिए शरिया कानून के 3 बड़े दरवाजे
सऊदी अरब के मुकद्दस शहर मक्का में स्थित एक मस्जिद के भीतर कथित रूप से 'नाजायज और अशोभनीय हरकत' करने के संगीन आरोप में बांग्लादेशी मूल के नजरुल इस्लाम अब्दुल बसीर और महिला सिती अख्तर को मौत के घाट उतारने के फैसले ने पूरी दुनिया में सनसनी फैला दी है। सऊदी अरब के गृह मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार दोनों विदेशी नागरिकों को शरिया कानून की उस विशेष श्रेणी के तहत मृत्युदंड दिया गया जिसे इस्लामी फिकह (न्यायशास्त्र) में 'ताजीर' (Tazir) कहा जाता है। इस फैसले के अमल में आते ही बांग्लादेश की राजधानी ढाका से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में तीखा आक्रोश फैल गया है, क्योंकि बांग्लादेश सरकार का सीधा आरोप है कि सऊदी हुकूमत ने उनके नागरिकों को फांसी के फंदे पर लटकाने से पूर्व न तो बांग्लादेशी दूतावास को कोई औपचारिक सूचना दी और न ही विधिक सहायता का कोई अवसर प्रदान किया। इस घटना के बाद पूरी दुनिया में यह कानूनी बहस छिड़ गई है कि आखिर इस्लाम में मौत की सजा किन-किन अपराधों में दी जा सकती है और क्या विवेकाधीन शक्ति के आधार पर किसी गैर-हिंसक कृत्य के लिए जान लेना इस्लामी न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल है।
शरिया कानून में अपराध और सजा के 3 बुनियादी दरवाजे: हुदूद, किसास और ताजीर को समझें
इस्लामी न्यायशास्त्र और शरिया विधान में किसी भी जुर्म को उसकी गंभीरता, साक्ष्य के स्तर और पीड़ित के अधिकारों के आधार पर मुख्य रूप से तीन बड़े विधिक वर्गों में विभाजित किया गया है। इन तीनों ही धाराओं के अंतर्गत जान लेने यानी मृत्युदंड का प्रावधान मौजूद है, परंतु उनकी शर्तें, गवाही के पैमाने और प्रक्रियाएं एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं:
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हुदूद (Hudud): ये वे अपराध हैं जिन्हें सीधे तौर पर 'अल्लाह के अधिकारों का उल्लंघन' माना जाता है। इनकी परिभाषा और इनकी सजाएं पवित्र कुरान और हदीस में अक्षरशः पहले से निर्धारित हैं। इनमें विवाहित व्यक्ति द्वारा जिना (व्यभिचार), इर्तिदाद (धर्म त्याग), डकैती (हिराबा) और विद्रोह जैसे गंभीर मामले शामिल होते हैं। हुदूद अपराधों में यदि जुर्म कड़े साक्ष्यों के साथ साबित हो जाता है, तो न्यायाधीश यानी काजी के पास सजा को बदलने, माफ करने या कम करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता।
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किसास (Qisas): यह 'समान बदले' और प्रतिशोध का विधिक सिद्धांत है, जो केवल हत्या या जानबूझकर गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने के मामलों में लागू होता है। किसास के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी की हत्या करता है, तो मारे गए व्यक्ति के परिजनों और कानूनी वारिसों को यह अधिकार प्राप्त होता है कि वे अदालत से हत्यारे के लिए मौत की सजा की मांग करें। हालांकि किसास में एक बड़ा मानवीय विकल्प 'दीया' यानी ब्लड मनी (मुआवजा/खूनबहा) का भी होता है, जहां पीड़ित परिवार अगर चाहे तो मुआवजा स्वीकार कर मुजरिम की जान बख्श सकता है।
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ताजीर (Tazir): यह न्यायाधीश का 'विवेकाधीन अधिकार' कहलाता है। इसके अंतर्गत वे सभी अपराध आते हैं जिनकी निश्चित सजा कुरान या हदीस में तय नहीं की गई है। ताजीर के मामलों में काजी या जज अपने विवेक, सामाजिक प्रभाव और परिस्थितिजन्य ज्ञान के आधार पर यह तय करता है कि किसी हरकत को अपराध माना जाए या नहीं, और यदि अपराध सिद्ध होता है तो मुजरिम को चेतावनी, आर्थिक दंड, कोड़े, कारावास या फिर असाधारण परिस्थितियों में मृत्युदंड दिया जाए। सऊदी अरब में कोई संहिताबद्ध लिखित दंड संहिता (पीनल कोड) न होने के कारण वहां के काजियों को ताजीर के तहत असीमित कानूनी अधिकार मिले हुए हैं।
मक्का की मस्जिद में अशोभनीय कृत्य: सऊदी अरब ने ताजीर के तहत क्यों दी सबसे बड़ी सजा?
सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने अपने विस्तृत स्पष्टीकरण में साफ तौर पर कहा कि बांग्लादेशी जोड़े को मृत्युदंड ताजीर के विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए सुनाया गया है। सऊदी न्यायपालिका और हुकूमत का आधिकारिक तर्क है कि यह कृत्य केवल एक सामान्य सामाजिक अपराध नहीं था, बल्कि यह अपराध पृथ्वी के सबसे मुकद्दस स्थल मक्का की एक मस्जिद की चारदीवारी के भीतर किया गया। सऊदी अधिकारियों के अनुसार इस हरकत से इबादतगाह की पवित्रता, मर्यादा और शुचिता को गहरी ठेस पहुंची है। मंत्रालय का मानना है कि पवित्र स्थल और इबादत के समय की पाकीजगी का जानबूझकर किया गया गंभीर उल्लंघन समाज के नैतिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाला अक्षम्य अपराध है, इसलिए न्यायाधीश ने सामाजिक रोकथाम और सार्वजनिक अनुशासन का कड़ा उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए दोनों को ताजीर के तहत मृत्युदंड की सजा देना सर्वथा उचित समझा।
इस्लामी न्याय के उसूलों पर उठ रहे सवाल: क्या ताजीर में जान लेना शरीयत सम्मत है?
इस फांसी की कार्रवाई के बाद दुनिया भर के इस्लामी न्यायविदों और मुफ्ती-ए-कराम का एक बड़ा वर्ग इस फैसले की विधिक वैधता पर सवाल उठा रहा है। इस्लामी फिकह के जानकारों का तर्क है कि यह फैसला इस्लामी न्याय की मूल भावना के अनुरूप नहीं दिखता, जिसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
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ताजीर में मृत्युदंड का सीमित दायरा: बहुसंख्यक इस्लामी विद्वानों और न्यायविदों का मानना है कि ताजीर का मूल उद्देश्य अपराधी में सुधार लाना और समाज को अपराध से रोकना है, न कि प्रतिशोध में जान लेना। पारंपरिक फिकह के अनुसार मौत की सजा केवल हुदूद और किसास तक ही सीमित रहनी चाहिए, जहां गवाही के अत्यंत कड़े और अका