लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक सफर: साल 1990 का वो दौर जब बिहार की राजनीति में हमेशा के लिए कायम हो गया 'लालू राज

लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक सफर: साल 1990 का वो दौर जब बिहार की राजनीति में हमेशा के लिए कायम हो गया 'लालू राज

भारतीय राजनीति के फलक पर जब भी कुछ चुनिंदा और सबसे करिश्माई नेताओं का जिक्र होता है, तो उसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का नाम सबसे ऊपर और बहुत ही अलग अंदाज में लिया जाता है। नब्बे के दशक की शुरुआत यानी साल 1990 का वो ऐतिहासिक दौर भारतीय लोकतंत्र और खासकर उत्तर भारत की राजनीति में एक बहुत बड़ा और कभी न भूलने वाला मील का पत्थर साबित हुआ था, जब तमाम राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त करते हुए लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सत्ता की बागडोर अपने हाथों में संभाली थी। ग्रामीण भारत की भाषा, ठेठ देसी अंदाज, गरीबों और पिछड़ों के हक की मुखर आवाज उठाने की उनकी अनूठी शैली ने उन्हें रातों-रात जननायक के रूप में स्थापित कर दिया था, जिसके बाद से बिहार की सियासत का पूरा केंद्र बिंदु ही हमेशा के लिए बदल गया। आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, एईओ (AEO) और एसईओ (SEO) की सभी आधुनिक गाइडलाइन्स और गूगल डिस्कवर की पत्रकारिता शैली को ध्यान में रखकर तैयार किए गए इस विस्तृत आर्टिकल में हम आपको उसी सुनहरे और संघर्षपूर्ण दौर की पूरी कहानी बताने जा रहे हैं जब बिहार में 'लालू राज' का युग शुरू हुआ था।

साल 1990 का राजनीतिक भूचाल और कैसे जनता दल के इस युवा नेता ने संभाली थी बिहार की कमान

आठवें और नब्बे के दशक के शुरुआती सालों में देश भर में वीपी सिंह के नेतृत्व में मंडल कमीशन की सिफारिशों और सामाजिक न्याय की लहर जोर पकड़ रही थी, जिसका सबसे बड़ा केंद्र बिहार राज्य बना हुआ था। उस दौर में छात्र राजनीति से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले लालू प्रसाद यादव ने रामसुंदर दास और सत्येंद्र नारायण सिंह जैसे दिग्गज नेताओं के वर्चस्व को चुनौती देते हुए जनता पार्टी और जनता दल के भीतर अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली थी कि वे मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे आ गए। मार्च 1990 में जब लालू प्रसाद यादव ने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो किसी को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला युवा नेता आने वाले कई दशकों तक राज्य की राजनीति की धुरी बना रहेगा। उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बिहार के वंचित, शोषित और पिछड़े तबके के लोगों के अंदर एक ऐसा नया राजनीतिक आत्मविश्वास जागा, जिसने सदियों से चली आ रही सामंती व्यवस्था की चूलें हिलाकर रख दीं और लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी का जोरदार अहसास कराया।

'लालू राज' की अनूठी शैली: गरीबों की जुबान बनकर सत्ता के गलियारों में कायम किया अपना दबदबा

लालू प्रसाद यादव के शासन करने का तरीका पारंपरिक राजनेताओं से बिल्कुल अलग और बेहद अनूठा था, क्योंकि वे फाइलों और बंद कमरों की राजनीति के बजाय सीधे जनता के बीच चौपाल लगाकर फैसले लेने में विश्वास रखते थे। पटना के मुख्यमंत्री आवास के दरवाजे हर आम और गरीब इंसान के लिए हमेशा खुले रहते थे, जहां कोई भी बेझिझक आकर अपनी शिकायत सीधे 'लालू भैया' से कह सकता था, और वे तुरंत अधिकारियों को फोन लगाकर उसका समाधान करने का निर्देश देते थे। उनके भाषणों का वो ठेठ मगही और भोजपुरी अंदाज, चुटीले किस्से और विरोधियों पर तीखे कटाक्ष करने की शैली जनता के दिलों में सीधे उतर जाती थी, जिसके कारण उनके विरोधी लाख कोशिशों के बावजूद कभी उनके जनसमर्थन में सेंध नहीं लगा पाए। हालांकि, उनके आलोचक और विपक्षी दल इस प्रशासनिक शैली को 'जंगल राज' कहकर लगातार निशाना बनाते थे, लेकिन उनके करोड़ों समर्थक इसे सामाजिक न्याय और पिछड़ों के स्वाभिमान की लड़ाई मानते हुए हर परिस्थिति में उनके साथ चट्टान की तरह खड़े नजर आते थे।

मुसीबतें, गिरफ्तारियां और कानूनी लड़ाइयां: हर राजनीतिक तूफान के बीच अपनी शर्तों पर राजनीति करने की जिद

लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक सफर में उतार-चढ़ाव और मुसिबतों का सिलसिला कभी नहीं थमा, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वे हर विपत्ति को भी अपनी राजनीतिक ताकत में बदलने का हुनर अच्छी तरह जानते थे। जब देश की राजनीति में भूचाल आया और उनके ऊपर चारा घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, तब भी उन्होंने झुकने के बजाय अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने के लिए मास्टरस्ट्रोक चलते हुए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया। जेल की सलाखों के पीछे जाने के बाद भी उनकी राजनीतिक पकड़ और रुतबे पर कोई फर्क नहीं पड़ा, और वे लगातार अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाते रहे। तमाम केंद्रीय जांच एजेंसियों के शिकंजे, अदालती मामलों और राजनीतिक रूप से उन्हें नेस्तनाबूद करने की साजिशों के बावजूद लालू प्रसाद यादव ने कभी किसी के सामने घुटने नहीं टेके और हमेशा अपनी ही शर्तों पर राजनीति का पासा फेंका, जो आज की तारीख में भी भारतीय राजनीति में एक मिसाल माना जाता है।

बिहार की सियासत पर आज भी अमिट छाप: सामाजिक न्याय और परिवारवाद के बीच की लंबी लड़ाई

आज भले ही लालू प्रसाद यादव स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति की अग्रिम पंक्ति से थोड़ा दूर हैं और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव पार्टी की कमान संभाल रहे हैं, लेकिन बिहार की राजनीति का हर पन्ना आज भी उनके बिना अधूरा माना जाता है। उन्होंने जिस सामाजिक न्याय की नींव नब्बे के दशक में रखी थी, उसने राज्य की राजनीति के समीकरणों को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया, और आज कोई भी राजनीतिक दल दलितों, पिछड़ों और अति पिछड़ों की उपेक्षा करके बिहार में सत्ता हासिल करने की कल्पना तक नहीं कर सकता। 'लालू राज' के उस दौर को लेकर आज भी राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि एक साधारण परिवार से उठकर देश के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय क्षत्रप बनने की उनकी यह दास्तान भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।