Rajasthan High Court : सम्मान से जीने का हक सबको है, 14 लोगों से जान का खतरा बताने वाले व्यक्ति को सुरक्षा देने का आदेश
News India Live, Digital Desk: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि प्रत्येक नागरिक के जीवन और अंगों की रक्षा करना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है। जोधपुर के बिलाड़ा निवासी 50 वर्षीय बाबू लाल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति फरजंद अली ने पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने पर विचार करें। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के जीवन को खतरा सीधे तौर पर संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
क्या है पूरा मामला? (The Background)
बाबू लाल ने हाईकोर्ट में एक आपराधिक रिट याचिका दायर कर अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई थी।
14 लोगों से खतरा: याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसे कम से कम 14 लोगों से गंभीर जानलेवा धमकियां मिल रही हैं।
पुलिस की उदासीनता: बाबू लाल का दावा था कि उसने पहले स्थानीय पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों से मदद मांगी थी, लेकिन सुरक्षा नहीं मिलने के कारण उसे मजबूरी में हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
हाईकोर्ट की 3 महत्वपूर्ण टिप्पणियां (Key Highlights)
| कोर्ट की टिप्पणी | निहितार्थ (Meaning) |
|---|---|
| अनुच्छेद 21 का महत्व | संविधान जीवन, अंगों की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। |
| सम्मानजनक जीवन | स्वतंत्र भारत का हर नागरिक सम्मान और गरिमा के साथ जीने का हकदार है। |
| पुलिस की जिम्मेदारी | खतरे का आकलन (Threat Assessment) करना और सुरक्षा देना पुलिस का संवैधानिक दायित्व है। |
कोर्ट का आदेश और भविष्य की कार्रवाई
अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं:
पुलिस कमिश्नर को निर्देश: जोधपुर पुलिस कमिश्नर/एसपी को निर्देश दिया गया है कि वे बाबू लाल की शिकायत को गंभीरता से सुनें।
खतरे का आकलन: पुलिस टीम को याचिकाकर्ता की स्थिति और उसे मिल रही धमकियों की वास्तविकता की जांच (Analysis) करने को कहा गया है।
सुरक्षा का प्रावधान: यदि जांच में खतरा वास्तविक पाया जाता है, तो तुरंत प्रभाव से 'पर्याप्त सुरक्षा' (Adequate Security) प्रदान की जाए।
क्या इसका असर अन्य केसों पर पड़ेगा?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ कर दिया कि सुरक्षा देने का यह आदेश बाबू लाल के खिलाफ चल रही किसी भी अन्य दीवानी या आपराधिक कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेगा। यानी, यदि याचिकाकर्ता पर कोई मुकदमा है, तो वह जारी रहेगा, लेकिन एक नागरिक के तौर पर उसकी जान की सुरक्षा सर्वोपरि होगी।
इस फैसले से यह संदेश गया है कि जब भी किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता या जीवन पर संकट आएगा, न्यायपालिका हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगी।