BREAKING:
April 14 2026 01:23 am

Raj Bhavan Renamed : अंग्रेजों की रईसी वाली निशानी खत्म अब सेवा तीर्थ कहलाएगा पीएमओ, देखिए नई लिस्ट

Post

News India Live, Digital Desk : क्या आपको 'राजभवन' शब्द सुनकर कभी ऐसा नहीं लगा कि यह किसी राजा-महाराजा या शासक की जगह है? हम एक लोकतांत्रिक देश (Democracy) में रहते हैं, जहाँ जनता मालिक होती है और नेता सेवक। लेकिन फिर भी, हमारे संवैधानिक पदों के निवास और दफ्तरों के नाम अभी भी अंग्रेजों के जमाने वाले 'रुआब' से भरे थे।

लेकिन अब यह सब बदल गया है। केंद्र सरकार ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लेते हुए 'राज भवन' का नाम बदलकर 'लोक भवन' और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के नए परिसर का नाम 'सेवा तीर्थ' कर दिया है।

यह खबर सुनने में शायद आपको छोटी लगे, लेकिन इसका मतलब बहुत गहरा है। आइए, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर सरकार ने ऐसा क्यों किया और इसके मायने क्या हैं।

1. राजभवन से 'लोक भवन' क्यों?

हर राज्य में राज्यपाल (Governor) के सरकारी आवास को 'राजभवन' कहा जाता था। 'राज' शब्द का सीधा मतलब है- शासन करना या हुकूमत करना। यह नाम उस दौर की याद दिलाता था जब ब्रिटिश गवर्नर भारतीयों पर राज करते थे।
अब इसका नाम 'लोक भवन' (Lok Bhavan) कर दिया गया है।

  • मतलब: 'लोक' यानी जनता। यह नाम बताता है कि राज्यपाल का घर जनता का है और वह जनता के कल्याण के लिए वहाँ बैठे हैं, न कि उन पर राज करने के लिए। यह लोकतंत्र की असली भावना को दर्शाता है।

2. पीएमओ बना 'सेवा तीर्थ'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए कार्यालय और कार्यकारी परिसर (Executive Enclave) को अब 'सेवा तीर्थ' (Seva Teerth) के नाम से जाना जाएगा।

  • मतलब: पीएमओ वह जगह है जहां देश के सबसे महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते हैं। इसे 'तीर्थ' कहकर सरकार ने यह संदेश दिया है कि सत्ता में बैठना कोई भोग-विलास नहीं, बल्कि एक पवित्र जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री 'प्रधान सेवक' हैं और उनका ऑफिस सेवा का मंदिर है।

इसके साथ ही, प्रधानमंत्री के निवास को 'सेवा कुंज' कहा जाएगा। याद कीजिये, पहले रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर 'लोक कल्याण मार्ग' किया गया था, यह उसी दिशा में अगला कदम है।

3. 'राजपथ' से 'कर्तव्य पथ' तक का सफर

आपको याद होगा कि कुछ समय पहले इंडिया गेट के सामने वाली सड़क 'राजपथ' का नाम बदलकर 'कर्तव्य पथ' किया गया था। सरकार का विजन बिल्कुल साफ है- वह दिमाग से "गुलामी की मानसिकता" (Colonial Mindset) को निकालना चाहती है।

नाम बदलने से इमारतों की ईंटें नहीं बदलतीं, लेकिन उनमें काम करने वाले लोगों का नज़रिया जरूर बदल जाता है। जब कोई अधिकारी 'सेवा तीर्थ' में प्रवेश करेगा, तो उसे सत्ता की ताकत नहीं, बल्कि जनता की सेवा करने का अपना 'कर्तव्य' याद आएगा।