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April 13 2026 02:55 am

Jharkhand : सूचना आयुक्तों की नियुक्ति पर राजभवन का ब्रेक, राज्यपाल ने सरकार को लौटाई फाइल

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News India Live, Digital Desk: झारखंड राज्य सूचना आयोग में खाली पड़े पदों को भरने की कवायद एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में फंस गई है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने सूचना आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित फाइल राज्य सरकार को वापस कर दी है। राज्यपाल ने विशेष रूप से उन नामों पर गंभीर कानूनी आपत्तियां जताई हैं, जो सक्रिय राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं या पार्टी पदों पर आसीन हैं। राजभवन के इस सख्त रुख के बाद राज्य सरकार की 'पसंद' पर सवालिया निशान लग गया है।

1. विवाद की जड़: सूचना आयुक्त या 'पार्टी प्रवक्ता'?

राज्य सरकार ने सूचना आयोग के चार रिक्त पदों के लिए नामों का चयन कर राजभवन भेजा था।

राजनीतिक पृष्ठभूमि: चर्चा है कि इन चार नामों में से तीन ऐसे व्यक्ति हैं जो प्रमुख राजनीतिक दलों के सक्रिय सदस्य या प्रवक्ता रहे हैं।

राज्यपाल का तर्क: राज्यपाल गंगवार ने फाइल लौटाते हुए स्पष्ट किया है कि सूचना आयुक्त का पद एक निष्पक्ष और अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) प्रकृति का होता है। ऐसे में सक्रिय राजनीति से जुड़े व्यक्तियों की नियुक्ति इस संवैधानिक पद की निष्पक्षता और पारदर्शिता को प्रभावित कर सकती है।

2. सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स का हवाला

राजभवन सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों का अध्ययन करने के बाद यह निर्णय लिया है।

कानूनी पेच: अदालत के निर्देशों के अनुसार, सूचना आयुक्तों का चयन विभिन्न क्षेत्रों (जैसे कानून, विज्ञान, तकनीक, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता या प्रशासन) के विशिष्ट व्यक्तियों में से किया जाना चाहिए। राज्यपाल ने सरकार से पूछा है कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को इन श्रेणियों में किस आधार पर शामिल किया गया है।

3. सूचना आयोग की स्थिति और हाई कोर्ट का दबाव

झारखंड राज्य सूचना आयोग पिछले काफी समय से मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य आयुक्तों की कमी से जूझ रहा है।

लंबित मामले: आयुक्तों के न होने के कारण हजारों द्वितीय अपीलें (2nd Appeals) लंबित हैं, जिससे सूचना का अधिकार (RTI) कानून बेअसर साबित हो रहा है।

अदालत की सख्ती: झारखंड हाई कोर्ट में इस मामले को लेकर 13 अप्रैल 2026 को सुनवाई होनी है। कोर्ट ने पहले ही नियुक्तियों में देरी को लेकर नाराजगी जताई थी। माना जा रहा है कि राज्यपाल ने कोर्ट की सुनवाई से ठीक पहले फाइल लौटाकर गेंद वापस सरकार के पाले में डाल दी है।

4. आगे क्या? सरकार के पास दो रास्ते

अब हेमंत सोरेन सरकार के पास इस गतिरोध को सुलझाने के लिए दो ही विकल्प शेष हैं:

नामों में बदलाव: सरकार राज्यपाल की आपत्तियों को स्वीकार करते हुए विवादित नामों को हटाकर गैर-राजनीतिक और विशेषज्ञों के नाम दोबारा भेजे।

स्पष्टीकरण और दोबारा वही फाइल: सरकार उन नामों की योग्यता पर अपना पक्ष स्पष्ट करे, हालांकि राज्यपाल द्वारा दोबारा आपत्ति जताने पर टकराव बढ़ सकता है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

विपक्षी दलों ने राज्यपाल के इस कदम का स्वागत किया है। भाजपा का कहना है कि सरकार सूचना आयोग को अपनी पार्टी का 'रिटायरमेंट होम' बनाना चाहती है, जिसे राज्यपाल ने रोककर लोकतंत्र की रक्षा की है। वहीं, सत्ता पक्ष के नेताओं का तर्क है कि राजनीतिक अनुभव भी सार्वजनिक सेवा का एक हिस्सा है और इसमें कुछ भी अवैध नहीं है।