पंजाब कांग्रेस में बार-बार बदले चेहरे, फिर भी क्यों नहीं थम रही अंतर्कलह और गुटबाजी

पंजाब कांग्रेस में बार-बार बदले चेहरे, फिर भी क्यों नहीं थम रही अंतर्कलह और गुटबाजी

पंजाब की राजनीति में कांग्रेस पार्टी का इतिहास उठा कर देखें तो एक बात बेहद साफ नजर आती है—यहां पार्टी के भीतर चेहरों और अध्यक्षों के बदलने का सिलसिला पिछले तीन दशकों से लगातार जारी है, लेकिन इसके बावजूद नेताओं के बीच आपसी खींचतान और गुटबाजी कभी थमती नहीं दिखाई दी। कैप्टन अमरिंदर सिंह के लंबे दौर से लेकर हाल ही में अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के कार्यकाल तक, पंजाब कांग्रेस हमेशा से अलग-अलग शक्ति केंद्रों और खेमेबंदी का अखाड़ा बनी रही है। कभी संगठन और सरकार के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ी, तो कभी मुख्यमंत्री के चेहरे और चुनावी कमान को लेकर नेता दो अलग-अलग रास्तों पर खड़े नजर आए।

कैप्टन अमरिंदर सिंह के दौर से शुरू हुई खींचतान

पंजाब कांग्रेस में इस अंदरूनी कलह का इतिहास काफी पुराना है। साल 1997 में राजिंदर कौर भट्ठल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद अमरिंदर सिंह के साथ उनके मतभेद खुलकर सामने आए थे, और विधायक दल के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर विवाद लगातार गहराता गया था। इसके बाद 1999 में अमरिंदर सिंह खुद प्रदेश अध्यक्ष बने और उनकी अगुवाई में साल 2002 में कांग्रेस ने सत्ता हासिल की और अमरिंदर राज्य के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, कुर्सी संभालने के बाद भी पार्टी के भीतर असंतोष और विरोध के स्वर पूरी तरह शांत नहीं हुए।

वर्ष 2005 आते-आते राज्य के करीब दो दर्जन विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के नेतृत्व के खिलाफ खुलकर बगावत कर दी और मोर्चा खोल दिया। यह मामला इतना अधिक बढ़ गया कि पार्टी हाईकमान को बीच-बचाव करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके बाद से प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर कई चेहरे आए और गए, लेकिन पार्टी के भीतर अलग-अलग क्षत्रप अपनी-अपनी पकड़ मजबूत करने की होड़ में हमेशा आपस में उलझते रहे।

बाजवा-अमरिंदर की खुली जंग और सिद्धू का दौर

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद पार्टी की कमान प्रताप सिंह बाजवा को सौंपी गई। इसके बाद बाजवा और कैप्टन अमरिंदर सिंह के समर्थकों के बीच संगठन पर नियंत्रण पाने को लेकर खुली राजनीतिक जंग छिड़ गई। आखिरकार 2015 में बाजवा के हटने के बाद अमरिंदर सिंह दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बने और 2017 के चुनाव में पार्टी को शानदार जीत दिलाई।

लेकिन सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और तत्कालीन मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच वैचारिक और राजनीतिक दूरियां लगातार बढ़ती चली गईं। साल 2019 में सिद्धू ने अपने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और साल 2021 में जब उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, तो यह टकराव अपने चरम पर पहुंच गया। इस तीखी खींचतान का नतीजा यह निकला कि कुछ ही महीनों के भीतर अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा।

राजा वडिंग और चन्नी का नया समीकरण

साल 2022 में अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को पंजाब कांग्रेस की कमान सौंपी गई। विधानसभा चुनावों में हार के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बिखरे हुए संगठन को एकजुट करने की थी, लेकिन पार्टी के भीतर दिग्गजों के अपने-अपने खेमे सक्रिय बने रहे। हाल ही में पार्टी हाईकमान ने वडिंग को जहां प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति की बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी। इसके बाद से ही पार्टी के भीतर इन दोनों नेताओं के इर्द-गिर्द नए शक्ति केंद्रों के उभरने की चर्चाएं तेज हो गईं और दोनों गुटों की सक्रियता ने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर सुगबुगाहट पैदा कर दी।

चुनावी साल में पुरानी चुनौती और एकजुटता का दावा

आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस के सामने एक बार फिर वही पुरानी और सबसे बड़ी चुनौती आन खड़ी हुई है—तमाम नाराज और असंतुष्ट नेताओं को एक मंच पर लाकर खड़ा करना। कभी कैप्टन अमरिंदर के समय सरकार और संगठन के बीच संघर्ष था, तो बाद में सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी के दौर में नेतृत्व का सवाल मुख्य केंद्र बन गया।

हालांकि, पार्टी के भीतर इस प्रकार की गुटबाजी को लेकर कांग्रेस के अनुशासन कमेटी के चेयरमैन और पूर्व मंत्री अवतार हेनरी इसे किसी भी बड़े राजनीतिक दल के भीतर की एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया करार देते हैं। उनका मानना है कि जब चुनाव नजदीक आते हैं, तो दल के सभी नेता अपने आपसी मतभेदों को एक तरफ रख कर पार्टी की जीत के लिए एकजुट होकर मैदान में उतर जाते हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में कांग्रेस का यह शीर्ष नेतृत्व इन पुरानी आंतरिक दूरियों को पाटने में कितना कामयाब हो पाता है।