बिखरने लगा अकाली दल पुनर सुरजीत: एक-एक कर साथ छोड़ रहे दिग्गज नेता
पंजाब की क्षेत्रीय और पंथक राजनीति में एक समय बड़े बदलाव के दावे के साथ उभरे 'अकाली दल पुनर सुरजीत' के भीतर इस वक्त सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के भीतर पनपा अंदरूनी असंतोष अब पूरी तरह से सड़कों पर और मीडिया के सामने आ चुका है। एक-एक करके पार्टी के संस्थापक सदस्यों, वरिष्ठ पंथक चेहरों और जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले दिग्गज नेताओं ने संगठन का साथ छोड़ना शुरू कर दिया है। लगातार हो रहे इन बड़े राजनीतिक झटकों के कारण पार्टी बिखरने की कगार पर पहुंच गई है। शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिए जा रहे एकतरफा फैसलों, संगठनात्मक तालमेल की कमी और कार्यकर्ताओं की अनदेखी को लेकर असंतुष्ट नेताओं का गुस्सा अब सीधे इस्तीफों के रूप में बाहर आ रहा है। राज्य के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में पार्टी का संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह से ध्वस्त हो सकता है और इसके पुनरुत्थान के सभी दावों पर पानी फिर सकता है।
संगठन के भीतर एकतरफा फैसलों और पंथक विचारधारा से भटकाव की वजह से टूटने लगा भरोसा
अकाली दल पुनर सुरजीत को छोड़ने वाले वरिष्ठ नेताओं और पूर्व पदाधिकारियों का आरोप है कि पार्टी जिस विजन और सिद्धांतों को लेकर आगे बढ़ी थी, मौजूदा समय में शीर्ष नेतृत्व उससे पूरी तरह भटक चुका है। नेताओं का कहना है कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सर्वसम्मति से फैसले लेने की परंपरा को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है। चंद चुनिंदा लोगों के इशारों पर लिए जा रहे फैसलों के कारण उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं और कद्दावर नेताओं में भारी निराशा फैली है, जिन्होंने दिन-रात एक करके संगठन को खड़ा किया था। इसके अलावा, पंजाब के ज्वलंत मुद्दों, किसानों के अधिकारों और पंथक मामलों पर पार्टी का स्पष्ट और प्रभावी रुख न होना भी नेताओं के मोहभंग की एक बड़ी वजह बना है। एक के बाद एक वरिष्ठ नेताओं के अलग होने से न केवल जिला स्तर पर संगठन कमजोर पड़ गया है, बल्कि कार्यकर्ताओं का भी नेतृत्व से भरोसा पूरी तरह से उठने लगा है।
पंजाब में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन बचाने की कड़ी चुनौती, आगे की राह हुई बेहद कठिन
पंजाब की मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में जहां मुख्यधारा की पार्टियां अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही हैं, वहीं अकाली दल पुनर सुरजीत के लिए अपनी बची-कुची राजनीतिक जमीन को बचाए रखना एक विकराल समस्या बन गया है। दिग्गजों के छोड़कर चले जाने के कारण पार्टी के पास अब जनाधार वाले बड़े चेहरों का भारी अकाल पड़ गया है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए चुनाव और जन-आंदोलनों के समय अपने मजबूत काडरों को एकजुट रखना सबसे अहम होता है, लेकिन यहां उल्टी गंगा बह रही है। यदि केंद्रीय नेतृत्व ने तुरंत हस्तक्षेप कर असंतुष्ट नेताओं से संवाद स्थापित नहीं किया और अपने काम करने के ढर्रे में बड़ा बदलाव नहीं लाया, तो पार्टी का पंजाब की राजनीति से पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो सकता है। फिलहाल, बगावत के इस नए दौर ने पार्टी अध्यक्ष और उनके रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है।