Political Stories : बिहार की राजनीति का वो किस्सा, जब एक निर्दलीय ने सीएम को ही हरा दिया और खुद मुख्यमंत्री बन गया
News India Live, Digital Desk: राजनीति में कुछ भी हो सकता है" - यह लाइन बिहार की सियासत पर बिल्कुल फिट बैठती है. यहां के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई अनोखे और हैरान करने वाले किस्से दफन हैं, जिन पर आज यकीन करना भी मुश्किल होता है. एक ऐसा ही अविश्वसनीय किस्सा है 1969 के विधानसभा चुनाव का, जब एक निर्दलीय उम्मीदवार ने न सिर्फ उस समय के मुख्यमंत्री को चुनाव में पटखनी दी, बल्कि बाद में खुद भी बिहार का मुख्यमंत्री बन गया.
यह कहानी है भोला पासवान शास्त्री की, जो सादगी और ईमानदारी की मिसाल थे, और बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री भी बने.
कैसे रचा गया यह इतिहास?
साल था 1969. बिहार में मध्यावधि चुनाव हो रहे थे. उस समय भोला पासवान शास्त्री पूर्णिया जिले की धमदाहा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे थे. खास बात यह थी कि वे किसी पार्टी के टिकट पर नहीं, बल्कि एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में थे. उनके सामने कांग्रेस पार्टी ने अपने दिग्गज नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह को उम्मीदवार बनाया था.
उस दौर में यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि कोई निर्दलीय उम्मीदवार, जिसके पास न तो कोई बड़ा संगठन था और न ही संसाधन, वह एक मुख्यमंत्री को सीधे मुकाबले में हरा देगा. लेकिन भोला पासवान शास्त्री की सादगी और उनकी जमीनी पकड़ काम कर गई. जब नतीजे आए, तो पूरा बिहार हैरान रह गया. भोला पासवान शास्त्री ने मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह को चुनाव में हरा दिया था.
पहले दलित मुख्यमंत्री बनने का गौरव
इस ऐतिहासिक जीत के बाद भोला पासवान शास्त्री का कद बिहार की राजनीति में बहुत ऊंचा हो गया. यह वही दौर था जब बिहार में कांग्रेस के खिलाफ एक मजबूत माहौल बन रहा था. चुनाव के बाद जब सरकार बनाने की बारी आई, तो गैर-कांग्रेसी दलों ने एकजुट होकर भोला पासवान शास्त्री को अपना नेता चुन लिया. और इस तरह, एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने वाले शास्त्री जी बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री बने.
कौन थे भोला पासवान शास्त्री?
- भोला पासवान शास्त्री का जन्म पूर्णिया जिले के एक बेहद गरीब दलित परिवार में हुआ था.
- पढ़ाई पूरी करने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े.
- वे तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सादगी का आलम यह था कि मुख्यमंत्री रहने के बाद भी उनके पास पटना में रहने के लिए अपना घर तक नहीं था. वे अक्सर अपने किसी विधायक मित्र के सर्वेंट क्वार्टर में रुकते थे.
- मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वे अक्सर रिक्शे या पैदल ही घूमते देखे जाते थे.
भोला पासवान शास्त्री की यह कहानी आज के दौर के नेताओं के लिए एक बड़ी सीख है. यह किस्सा बताता है कि अगर जनता का विश्वास आपके साथ हो, तो आप राजनीति में बड़े-बड़े उलटफेर कर सकते हैं, फिर चाहे आपके सामने मुख्यमंत्री ही क्यों न खड़ा हो.