PM मोदी ने जिसे कहा था गोल्डन गेट, उसके लिए बजट में नहीं मिला एक भी रुपया चाबहार पोर्ट पर भारत के फैसले से ईरान निराश

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News India Live, Digital Desk: भारत और ईरान के बीच रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले 'चाबहार बंदरगाह' (Chabahar Port) को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। इस साल पेश किए गए आम बजट में भारत सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए कोई भी फंड आवंटित नहीं किया है। इस फैसले पर अब ईरान की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बजट के इस कदम को दिल्ली और तेहरान दोनों के लिए बेहद निराशाजनक करार दिया है।

ईरान को याद आया PM मोदी का पुराना बयान

इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू के दौरान ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि फंड न मिलना दोनों देशों के लिए अच्छी खबर नहीं है। इसी के साथ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान की याद दिलाई, जिसमें पीएम ने चाबहार को 'गोल्डन गेट' (स्वर्ण द्वार) कहा था। अराघची ने जोर देते हुए कहा कि यह पोर्ट हिंद महासागर को मध्य एशिया, कॉकेसस और यूरोप से जोड़ने का एक बेहद रणनीतिक और अहम जरिया है। अगर इसका पूरा विकास हो जाए, तो यह पूरे क्षेत्र के व्यापार की तस्वीर बदल सकता है।

बजट में चाबहार के फंड का क्या हुआ?

बीते 1 फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए देश के आम बजट में चाबहार पोर्ट परियोजना के लिए एक रुपये का भी आवंटन नहीं किया गया। जबकि इससे पहले के वर्षों में भारत, ईरान के दक्षिणी तट (सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत) पर स्थित इस कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के लिए लगातार हर साल 100 करोड़ रुपये देता आ रहा था। पिछले साल के बजट में भी 100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन इस बार यह राशि शून्य कर दी गई है।

क्या अमेरिकी प्रतिबंध हैं इसकी वजह?

चाबहार पोर्ट के विकास में अमेरिका का रुख भी काफी मायने रखता है। पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने ईरान पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। हालांकि, चाबहार प्रोजेक्ट की अहमियत को देखते हुए भारत को इन प्रतिबंधों से 6 महीने की विशेष छूट दी गई थी। ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिका द्वारा दी गई यह छूट इसी साल 26 अप्रैल को खत्म होने जा रही है।

भारत के लिए क्यों गेम-चेंजर है चाबहार?

भारत और ईरान मिलकर लंबे समय से इस बंदरगाह का विकास कर रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य व्यापारिक संबंधों और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को तेज करना है।

ग्लोबल ट्रेड रूट: दोनों देश इसे 'अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे' (INSTC) का अभिन्न हिस्सा बनाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।

अफगानिस्तान तक आसान पहुंच: ईरानी राजदूत मोहम्मद फथाली भी पहले कह चुके हैं कि पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच बनाने के लिए यह पोर्ट भारत के लिए सबसे जरूरी रास्ता है। उन्होंने इस मुद्दे पर भारत के साथ संबंध और मजबूत करने की वकालत भी की थी।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अप्रैल में अमेरिकी छूट की मियाद खत्म होने के बाद भारत और ईरान इस प्रोजेक्ट के भविष्य को लेकर क्या अगला कदम उठाते हैं।