Padma Shri Award : जिस अफसर ने UPA सरकार के 'दबाव' के खिलाफ उठाई थी आवाज़, उसे मिला पद्मश्री सम्मान

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News India Live, Digital Desk : इस साल पद्म पुरस्कार पाने वालों की लिस्ट में एक ऐसा नाम भी शामिल है, जिसकी कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। ये नाम है आरवीएस मणि, गृह मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी, जिन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' से नवाज़ा गया है। लेकिन ये सिर्फ एक पुरस्कार नहीं है, बल्कि उस अफसर की हिम्मत और ईमानदारी का सम्मान है, जिसने एक दशक पहले देश की सबसे ताकतवर सरकार से टक्कर लेने का साहस दिखाया था।

कौन हैं आरवीएस मणि और क्या है उनका कनेक्शन?

आरवीएस मणि का नाम देश की राजनीति में भूचाल लाने वाले इशरत जहां एनकाउंटर केस से जुड़ा है। जब मणि गृह मंत्रालय में अंडर सेक्रेटरी के पद पर थे, तब यह केस अपने चरम पर था। आपको याद दिला दें कि 2004 में गुजरात पुलिस ने एक एनकाउंटर में इशरत जहां और तीन अन्य लोगों को मार गिराया था। पुलिस का दावा था कि ये सभी लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे।

वहीं, इस एनकाउंटर को मानवाधिकार संगठनों और तत्कालीन विपक्षी दलों ने 'फर्जी' करार दिया था। मामला कोर्ट में पहुंचा और यहीं से आरवीएस मणि की भूमिका शुरू हुई।

सरकार का 'दबाव' और एक अफसर की अंतरात्मा

मणि ने बाद में खुलासा किया कि उस वक्त की UPA सरकार ने उन पर भारी दबाव डाला था। उनका आरोप था कि सरकार के आला अधिकारी चाहते थे कि वह इस मामले में दिए जाने वाले हलफनामे (Affidavit) में बदलाव करें। उन्होंने दावा किया कि उन्हें उस हलफनामे से यह बात हटाने के लिए मजबूर किया गया था कि इशरत जहां और उसके साथियों के लश्कर-ए-तैयबा से आतंकी संबंध थे।

मणि के इस खुलासे ने देश की सियासत में तूफान ला दिया था। उन्होंने अपनी किताब "हिंदू टेरर: ए रियल स्टोरी" में भी इन घटनाओं का विस्तार से जिक्र किया है। उनका कहना था कि 'भगवा आतंकवाद' की एक झूठी कहानी गढ़ने के लिए सरकार के भीतर से ही एक ईमानदार जांच को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही थी।

सालों बाद मिला ईमानदारी का इनाम

एक अफसर के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़ा होना आसान नहीं होता, लेकिन मणि ने वही किया जो उन्हें सही लगा। अब, सालों बाद जब उन्हें 'पब्लिक अफेयर्स' के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है, तो इसे महज़ एक संयोग नहीं माना जा रहा।

कई लोग इसे उस अफसर की ईमानदारी और साहस के सम्मान के तौर पर देख रहे हैं, जिसने सत्ता के दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया था। यह पुरस्कार एक संदेश भी है कि सच और ईमानदारी का फल भले ही देर से मिले, लेकिन मिलता ज़रूर है।