खिलाड़ी से बैर और हसीना से यारी? ओवैसी ने बीसीसीआई और सरकार की नीति पर उठाए गंभीर सवाल

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News India Live, Digital Desk: AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी अपनी बेबाक बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने एक ऐसे मुद्दे पर सरकार को घेरा है जो क्रिकेट प्रेमियों और राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों, दोनों को चौंका रहा है। ओवैसी ने बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिजुर रहमान और बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को लेकर भारत सरकार और बीसीसीआई (BCCI) के 'दोहरे रवैये' पर तीखा तंज कसा है।

मामला क्या है?
दरअसल, मुद्दा जुड़ा है इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) से। खबर है कि बीसीसीआई ने इस बार बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को आईपीएल ऑक्शन (नीलामी) से दूर रखा या उनके खेलने पर अड़ंगा लगाया। इसे लेकर क्रिकेट फैंस में वैसे ही कानाफूसी चल रही थी, लेकिन अब ओवैसी ने इस आग में घी डालने का काम किया है।

ओवैसी ने एक जनसभा में गरजते हुए पूछा, "आखिर ये कैसी देशभक्ति है? एक तरफ तो आप बांग्लादेश के एक मामूली क्रिकेटर को आईपीएल में खेलने से रोक रहे हैं, और दूसरी तरफ उसी देश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिन पर वहां इतने गंभीर आरोप हैं, उन्हें भारत में मजे से मेहमान बनाकर रखा है।"

"हसीना को वापस क्यों नहीं भेजते?"
ओवैसी यहीं नहीं रुके। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा कि अगर सरकार बांग्लादेश को लेकर इतनी ही सख्त है कि वहां के खिलाड़ी यहां नहीं खेल सकते, तो फिर वहां की विवादित नेता को यहां पनाह क्यों दी जा रही है? उन्होंने मांग की है कि शेख हसीना को तुरंत बांग्लादेश वापस भेजा जाना चाहिए।

ओवैसी का कहना है कि यह अजीब बात है कि एक खिलाड़ी से तो देश की सुरक्षा या सम्मान को खतरा महसूस होता है, लेकिन एक नेता जिसकी वजह से पड़ोसी मुल्क में बवाल मचा, उसे हम सुरक्षा दे रहे हैं। यह सरकार की 'दोगली नीति' है।

क्रिकेट और राजनीति का कॉकटेल
यह पहली बार नहीं है जब खेल और राजनीति आमने-सामने आए हैं, लेकिन ओवैसी के इस बयान ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या वाकई मुस्तफिजुर जैसे खिलाड़ी को रोकना सही था, जबकि कूटनीतिक स्तर पर भारत शेख हसीना को शरण दिए हुए है?

कुल मिलाकर, ओवैसी ने गेंद अब सरकार और बीसीसीआई के पाले में डाल दी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बयान पर कोई सियासी भूचाल आता है या इसे भी एक चुनावी भाषण मानकर भुला दिया जाएगा। लेकिन इतना तय है, इस मुद्दे ने लोगों को सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया है।