Nuclear Cold War 2.0 : न्यू स्टार्ट संधि खत्म होते ही महाशक्तियों में ठनी, अमेरिका का चीन पर गंभीर आरोप क्या बीजिंग गुपचुप कर रहा है परमाणु परीक्षण?
News India Live, Digital Desk: दुनिया एक बार फिर परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी नजर आ रही है। रूस के साथ ऐतिहासिक 'न्यू स्टार्ट' (New START) संधि की समय सीमा समाप्त होते ही, अमेरिका ने अब चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय (State Department) ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी करते हुए दावा किया है कि चीन अपनी 'लोप नुर' (Lop Nur) परीक्षण साइट पर गुपचुप तरीके से परमाणु परीक्षण (Covert Nuclear Tests) कर रहा है।
क्या दुनिया से कुछ छिपा रहा है चीन?
अमेरिका की 'कम्प्लायंस रिपोर्ट' के मुताबिक, चीन की परमाणु गतिविधियों में अचानक आई तेजी और वहां होने वाले 'हाई-लेवल एक्टिविटी' से यह संदेह गहरा गया है कि बीजिंग 'जीरो-यील्ड' (Zero-yield) मानक का उल्लंघन कर रहा है।
रिपोर्ट की 3 सबसे चिंताजनक बातें:
सीक्रेसी का खेल: चीन अपनी परीक्षण साइटों के डेटा को अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्थाओं के साथ साझा नहीं कर रहा है।
तेजी से बढ़ता शस्त्रागार: अनुमान है कि चीन 2030 तक अपने परमाणु हथियारों की संख्या 1,000 के पार ले जाना चाहता है।
संधियों की अनदेखी: 'न्यू स्टार्ट' संधि के खत्म होने से अब हथियारों की संख्या पर कोई कानूनी लगाम नहीं रह गई है।
[Image: Satellite view of Lop Nur test site or Nuclear warhead silos illustration]
महाशक्तियों में 'ट्रायंगुलर' संघर्ष
अब तक परमाणु संतुलन मुख्य रूप से अमेरिका और रूस के बीच था, लेकिन अब चीन इस समीकरण का तीसरा और सबसे अनिश्चित कोना बन गया है।
अमेरिका का रुख: वॉशिंगटन चाहता है कि चीन भी किसी भी नई हथियार नियंत्रण संधि का हिस्सा बने।
चीन का तर्क: बीजिंग का कहना है कि उसका परमाणु जखीरा अमेरिका और रूस की तुलना में बहुत छोटा है, इसलिए वह किसी भी पाबंदी को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
'न्यू स्टार्ट' का अंत: विनाश की दस्तक?
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली आखिरी संधि 'न्यू स्टार्ट' का लैप्स होना वैश्विक सुरक्षा के लिए 'डेथ वारंट' जैसा है। बिना किसी निगरानी और निरीक्षण के, अब रूस, अमेरिका और चीन, तीनों ही बिना किसी रोक-टोक के अपने घातक हथियारों का विस्तार कर सकते हैं।"हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ परमाणु हथियारों की होड़ को रोकने वाला कोई अंतरराष्ट्रीय कानून प्रभावी नहीं रह गया है। यह 1960 के दशक से भी अधिक खतरनाक स्थिति है