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March 26 2026 12:51 pm

बच्चों की खुशी से ऊपर कुछ नहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने पलटा ब्रिटिश कोर्ट का आदेश, विदेशी नागरिकता के दावे को ठुकराया

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News India Live, Digital Desk: कानून की किताबों से ऊपर मानवीय संवेदनाओं और बच्चों के भविष्य को रखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी विदेशी अदालत का आदेश बच्चों के कल्याण (Welfare of Children) से बड़ा नहीं हो सकता। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने एक पिता की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने ब्रिटिश कोर्ट के आदेश का हवाला देकर अपने बच्चों की कस्टडी मांगी थी।

क्या था पूरा विवाद? (The Legal Battle)

यह मामला एक ऐसे परिवार का है जो ब्रिटेन में रहता था, लेकिन आपसी विवाद के बाद मां अपने दोनों बच्चों के साथ भारत लौट आई।

ब्रिटिश कोर्ट का आदेश: ब्रिटेन की एक अदालत ने आदेश दिया था कि बच्चों को वापस उनके पिता के पास यूके भेजा जाए।

पिता की दलील: पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की और कहा कि बच्चे ब्रिटिश नागरिक हैं, इसलिए उन्हें वहां वापस भेजा जाना चाहिए।

मां का पक्ष: मां ने बच्चों की सुरक्षा और भारत में उनके बेहतर भविष्य का हवाला दिया।

हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणियां: क्यों बदला फैसला?

जस्टिस की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए कुछ ऐसी बातें कहीं जो भविष्य के लिए मिसाल बन गई हैं:

कल्याण ही सर्वोपरि: कोर्ट ने कहा कि बच्चों की कस्टडी तय करते समय केवल 'विदेशी नागरिकता' या 'विदेशी कोर्ट का आदेश' आधार नहीं हो सकता। सबसे जरूरी यह देखना है कि बच्चा कहाँ खुश और सुरक्षित है।

भारत में जड़ें: कोर्ट ने पाया कि बच्चे भारत में अपनी मां के साथ घुल-मिल गए हैं, स्कूल जा रहे हैं और यहां के माहौल में सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

कानूनी दांवपेंच बनाम भावनाएं: अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय करना है, न कि किसी तकनीकी आदेश को बच्चों की इच्छा पर थोपना।

इस फैसले का क्या होगा असर?

यह फैसला उन हजारों 'Cross-Border' कस्टडी मामलों के लिए एक नजीर बनेगा जहां माता-पिता अलग-अलग देशों के कानून का सहारा लेकर बच्चों की कस्टडी पाने की कोशिश करते हैं। अब भारतीय अदालतें विदेशी आदेशों का सम्मान तो करेंगी, लेकिन अंतिम फैसला बच्चों के "सर्वोत्तम हित" (Best Interest) को देखकर ही लिया जाएगा।