Nitish Kumar Govt : वादों का पिटारा और हकीकत की जमीन ,क्या बिहार में NDA सरकार अपने वादे निभा पाएगी?

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News India Live, Digital Desk: राजनीति में वादे करना बड़ा आसान होता है। चुनाव के समय मंच से खड़े होकर नेताओं को 'चांद-तारे' तोड़ लाने की बातें करते हम सबने सुना है। लेकिन असली परीक्षा तब शुरू होती है जब कुर्सी मिल जाती है और जनता उन वादों का हिसाब मांगती है।

आज हम बात कर रहे हैं बिहार की नीतीश कुमार सरकार (Nitish Kumar Government) की। एक तरफ 'सुशासन बाबू' की छवि है, तो दूसरी तरफ NDA (बीजेपी+जेडीयू) का गठबंधन। सरकार चल रही है, लेकिन सवाल यह है— क्या वो वादे पूरे हो रहे हैं जो चुनाव के वक्त किए गए थे?

10 लाख नौकरियों का गणित और युवा का सवाल
बिहार में सबसे बड़ा मुद्दा हमेशा से 'रोजगार' रहा है। आपको याद होगा कि तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियों का वादा किया था, तो जवाब में एनडीए ने भी 19 लाख रोजगार देने की हुंकार भरी थी। अब, जब सरकार अपना कार्यकाल आगे बढ़ा रही है, तो बिहार का युवा पूछ रहा है— नौकरी कहाँ है?
सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि वादे और डिलीवरी में अभी बहुत बड़ा फासला (Gap) है। शिक्षकों की बहाली हुई जरूर है, लेकिन क्या वो काफी है? नीतीश सरकार पर सबसे बड़ा दबाव यही है कि बचे हुए समय में इस आंकड़े को कैसे छूएं।

'डबल इंजन' की सरकार से उम्मीदें
केंद्र में भी NDA और राज्य में भी NDA—इसे बीजेपी 'डबल इंजन' की सरकार कहती है। जनता को उम्मीद थी कि इससे बिहार का विकास बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से होगा। चाहे वो पटना मेट्रो हो, नए एम्स (AIIMS) हों, या दरभंगा एयरपोर्ट का विस्तार—काम चल रहा है, लेकिन रफ़्तार पर सवालिया निशान अब भी है। जनता अब "हो रहा है" नहीं, बल्कि "हो गया" सुनना चाहती है।

कानून-व्यवस्था: पुरानी शराब, नई बोतल?
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) उनकी 'लॉ एंड आर्डर' रही है। लेकिन पिछले कुछ समय में जिस तरह से आपराधिक घटनाएं घटी हैं, उससे "सुशासन" की इमेज पर थोड़ी धूल जमी है। शराबबंदी (Liquor Ban) को लेकर भी सरकार सवालों के घेरे में रहती है। एनडीए के अपने ही नेता कई बार दबी जुबान में सवाल उठाते हैं। ऐसे में सरकार को यह साबित करना होगा कि कानून का राज सिर्फ़ कागजों में नहीं, सड़कों पर भी है।

सहयोगी दलों का दबाव
गठबंधन की सरकार चलाना 'मेंढकों को तराजू में तोलने' जैसा है। बीजेपी के अपने वादे हैं (घोषणा पत्र) और जेडीयू के अपने 'सात निश्चय'। इन दोनों को साथ लेकर चलना और धरातल पर उतारना नीतीश कुमार के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। अब देखना यह है कि क्या सरकार आपसी खींचतान छोड़कर सिर्फ़ विकास पर फोकस कर पाती है?