Newborn Jaundice : बच्चे की आंखें पीली देखकर सहम गया दिल? जानिए आखिर क्यों होता है ऐसा और क्या है इसका पक्का इलाज
News India Live, Digital Desk: घर में जब किलकारी गूंजती है, तो खुशियों का ठिकाना नहीं रहता। माता-पिता बच्चे के नन्हे हाथ-पैर देखकर ही निहारते रहते हैं। लेकिन, कई बार जन्म के दो-तीन दिन बाद बच्चे की त्वचा या आंखों का रंग पीला (Yellow) दिखने लगता है। इसे देखकर नए मम्मी-पापा अक्सर डर जाते हैं। डॉक्टरी भाषा में इसे 'न्यूबॉर्न जॉन्डिस' (Newborn Jaundice) कहते हैं।
यकीन मानिए, यह बहुत ही सामान्य (Common) बात है। अस्पताल में जन्मे करीब 60% बच्चों में यह लक्षण देखने को मिल सकते हैं। लेकिन आखिर ऐसा होता क्यों है और इसे ठीक कैसे किया जाए? आइए, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।
क्यों होता है नवजात को पीलिया?
इसकी वजह हमारे शरीर का एक पिगमेंट है जिसे 'बिलीरुबिन' (Bilirubin) कहते हैं।
असल में, जब बच्चे का जन्म होता है, तो उसके शरीर में पुराने ब्लड सेल्स (Blood Cells) टूटते हैं और नए बनते हैं। इस प्रक्रिया में बिलीरुबिन नाम का पीला पदार्थ निकलता है। वयस्कों (बड़ों) में हमारा लीवर इसे आसानी से छानकर शरीर से बाहर निकाल देता है।
लेकिन, नन्हे बच्चे का लीवर अभी 'सीखने' के दौर में होता है। वह इतना विकसित नहीं होता कि इतनी तेजी से बिलीरुबिन को प्रोसेस कर सके। बस इसी वजह से यह पीला पदार्थ खून में जमा होने लगता है और बच्चे की त्वचा पीली दिखने लगती है।
लक्षण कैसे पहचानें? (Symptoms)
- सबसे पहले बच्चे का चेहरा पीला नजर आता है।
- इसके बाद यह पीलापन छाती और पेट की तरफ बढ़ता है।
- आंखों का सफेद हिस्सा भी पीला दिखने लगता है।
- चेक करने का तरीका: बच्चे की नाक या माथे को अपनी उंगली से हल्का सा दबाएं और छोड़ें। अगर दबाने वाली जगह पीली दिखती है, तो यह जॉन्डिस का संकेत है। अगर त्वचा गोरी वापस आती है, तो चिंता की बात नहीं है।
कब होती है चिंता की बात?
वैसे तो यह 'फिजियोलॉजिकल जॉन्डिस' होता है जो 1-2 हफ्ते में अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन आपको डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?
- अगर पीलापन पेट से नीचे पैरों और तलवों तक पहुँच जाए।
- अगर बच्चा दूध नहीं पी रहा हो या बहुत सुस्त (Sleepy) हो गया हो।
- अगर उसे बुखार जैसा लग रहा हो या वो बहुत जोर-जोर से रो रहा हो।
इलाज और बचाव (Treatment)
घरेलू बातों पर जाने से बेहतर है डॉक्टर की सुनें, लेकिन कुछ बेसिक चीजें मदद करती हैं:
- मां का दूध (Frequent Feeding): बच्चे को बार-बार ब्रेस्टफीडिंग कराएं। बच्चा जितना ज्यादा दूध पियेगा, उतना ज्यादा पॉटी (Poop) करेगा और बिलीरुबिन शरीर से बाहर निकलेगा। हाइड्रेशन सबसे बड़ा इलाज है।
- फोटोथेरेपी (Phototherapy): अगर लेवल ज्यादा है, तो डॉक्टर बच्चे को नीली रोशनी (Blue Light) में रखते हैं। इसे फोटोथेरेपी कहते हैं। यह लाइट बिलीरुबिन को तोड़ने में मदद करती है। यह पूरी तरह से सुरक्षित है।
- सूरज की रोशनी: हल्की (सुबह की गुनगुनी) धूप भी फायदेमंद मानी जाती है, लेकिन सीधी तेज धूप में बच्चे को न रखें, इससे उसकी नाजुक त्वचा जल सकती है।