BREAKING:
April 30 2026 06:35 pm

बांग्लादेश में नई आजादी या कट्टरपंथ की वापसी? एक नियुक्ति ने खड़े किए खौफनाक सवाल

Post

News India Live, Digital Desk: बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद लगा था कि वहां सब कुछ नया और बेहतर होगा। नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी, तो लोगों ने सोचा कि अब लोकतंत्र की हवा बहेगी। लेकिन हाल ही में वहां से एक ऐसी खबर आई है, जिसने सबको हैरानी में डाल दिया है। यह खबर न केवल बांग्लादेश के लोगों को, बल्कि पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर रही है कि आखिर पड़ोसी मुल्क किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

कूटनीति की कुर्सी और आतंक का कनेक्शन

असल मुद्दा एक नियुक्ति (Appointment) का है। मोहम्मद यूनुस की सरकार ने उमर बिन हदी नाम के एक शख्स को ब्रिटेन (लंदन) में बांग्लादेशी हाई कमीशन में 'फर्स्ट सेक्रेटरी' के पद पर तैनात किया है। सुनने में यह एक सामान्य सरकारी आदेश लगता है, लेकिन जैसे ही आप यह जानेंगे कि उमर बिन हदी कौन है, तो मामला गंभीर हो जाता है।

उमर बिन हदी किसी आम परिवार से नहीं आते। वे बांग्लादेश के कुख्यात कट्टरपंथी और आतंकी संगठन JMB (जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश) के सरगना रहे शेख अब्दुर रहमान के भाई हैं। यह वही शेख अब्दुर रहमान है, जिसे बांग्लादेश में आतंक फैलाने और बम धमाकों का दोषी माना गया था और बाद में उसे फांसी की सजा दी गई थी।

क्यों उठ रहे हैं सवाल?

अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस विचारधारा के खिलाफ बांग्लादेश सालों तक लड़ता रहा, क्या अब उसी विचारधारा से जुड़े परिवारों को सरकारी तंत्र में जगह दी जा रही है? एक तरफ सरकार दुनिया को भरोसा दिला रही है कि बांग्लादेश में सब कुछ सामान्य है, और दूसरी तरफ एक आतंकी सरगना के भाई को इतनी बड़ी कूटनीतिक जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। वो भी लंदन जैसे अहम शहर में, जहां से अंतरराष्ट्रीय संबंध साधे जाते हैं।

जानकार मानते हैं कि उमर बिन हदी की नियुक्ति कोई गलती नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा फैसला हो सकता है। यह इशारा करता है कि बांग्लादेश की मौजूदा सत्ता के तार कट्टरपंथी समूहों के प्रति नरम रुख अपना रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह 'इनाम' जैसा है।

चिंता की बात क्या है?

कूटनीतिक पदों पर बैठने वाले लोग देश का चेहरा होते हैं। ऐसे में एक ऐसे व्यक्ति को चुनना जिसका पारिवारिक इतिहास चरमपंथ से जुड़ा हो, भारत और पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय बन सकता है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह बांग्लादेश की राजनीति में कट्टरपंथियों की 'बैकडोर एंट्री' (पिछले दरवाजे से वापसी) है?

मोहम्मद यूनुस पर अब भारी दबाव है कि वे साफ करें कि 'न्यू बांग्लादेश' का रास्ता आधुनिकीकरण की तरफ जा रहा है या फिर पुराने कट्टरपंथी अंधेरों की तरफ। फिलहाल, लंदन जाने वाले जहाज में बैठे इस नए 'डिप्लोमेट' पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।