खेतों में काम और साप्ताहिक बाजार में बेची सब्जियां: 21 साल में 25 बार ट्रांसफर झेलने वाले तेज तर्रार IAS तुकाराम मुंडे की प्रेरणादायक कहानी

खेतों में काम और साप्ताहिक बाजार में बेची सब्जियां: 21 साल में 25 बार ट्रांसफर झेलने वाले तेज तर्रार IAS तुकाराम मुंडे की प्रेरणादायक कहानी

भारतीय सिविल सेवा (UPSC) के इतिहास में कुछ ऐसे बेबाक और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी भी दर्ज हैं, जिनकी कार्यशैली बड़े-बड़े राजनेताओं और माफियाओं के लिए मिसाल बन जाती है। ऐसे ही एक चर्चित, दबंग और ईमानदार अधिकारी हैं महाराष्ट्र कैडर के आईएएस तुकाराम मुंडे (IAS Tukaram Mundhe), जो वर्तमान में महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के कमिश्नर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अपने मात्र 21 साल के छोटे से प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान 25 बार तबादला झेल चुके तुकाराम मुंडे अपनी सख्त कार्यशैली और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के लिए जाने जाते हैं। महाराष्ट्र में हाल ही में उनके नेतृत्व में कई बड़े फूड आउटलेट्स और मिलावटखोरों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की गई है, जिससे यह साफ हो गया है कि वे जनता के स्वास्थ्य और अधिकारों से कोई समझौता करने वाले नहीं हैं। लेकिन इस कड़े प्रशासनिक मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जिसमें खेतों की मिट्टी की महक से लेकर यूपीएससी की कठिन परीक्षा तक का संघर्ष छिपा हुआ है। आइए विस्तार से जानते हैं कि खेतों में मजदूरी करने और साप्ताहिक बाजारों में सब्जियां बेचने वाला एक साधारण किसान का बेटा किस प्रकार देश का सबसे चर्चित आईएएस अधिकारी बना।

महाराष्ट्र के बीड जिले के एक गरीब किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं तुकाराम मुंडे

आईएएस तुकाराम मुंडे का जन्म महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बीड जिले के एक बेहद गरीब और साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि परिवार का भरण-पोषण करना भी एक बड़ी चुनौती हुआ करती थी। खेती-बारी की तमाम मुश्किलें, सूखा और कर्ज का भारी बोझ हमेशा उनके परिवार के सिर पर मंडराता रहता था। देश के अधिकांश ग्रामीण परिवारों की तरह उनका पूरा परिवार भी खेतों में फसलों को पानी देने के लिए पूरी तरह से मानसून की बारिश पर निर्भर रहता था। स्थिति इतनी विकट थी कि तुकाराम मुंडे को अपने परिवार के साथ खेतों में जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती थी और घर का खर्च चलाने के लिए वे साप्ताहिक बाजारों में जाकर खुद सब्जियां बेचा करते थे। वे अक्सर रात को 2 बजे ही उठ जाते थे और हाथों से खींचकर या पारंपरिक तरीकों से फसलों में पानी देते थे ताकि उनकी फसलें सूख न जाएं। उनका पूरा बचपन मिट्टी और ईंटों से बने एक कच्चे मकान में बीता, जहां सुख-सुविधाओं का नामोनिशान तक नहीं था।

सिस्टम का हिस्सा नहीं, बल्कि सिस्टम को बदलने के लिए चुनी प्रशासनिक सेवा

तुकाराम मुंडे के मन में बचपन से ही यह सवाल उठता था कि आखिर किसानों और आम जनता को हर छोटी-छोटी बात के लिए प्रशासनिक बाधाओं और भ्रष्टाचार का सामना क्यों करना पड़ता है। उन्होंने बहुत नजदीक से देखा था कि कैसे सरकारी प्रणालियों की कमियों के कारण उनके परिवार और आसपास के गरीब लोग पिसते रहते हैं। इसी पारिवारिक दर्द और सिस्टम की विसंगतियों ने उन्हें देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा यानी यूपीएससी (UPSC) की तैयारी करने के लिए प्रेरित किया। तुकाराम मुंडे ने एक इंटरव्यू में खुद इस बात का जिक्र किया था कि वे सिस्टम का सिर्फ हिस्सा बनने के लिए इस सेवा में नहीं आए थे, बल्कि उनका मुख्य उद्देश्य इस सिस्टम को अंदर से दुरुस्त करना और बदलना था। बिना किसी बड़ी और महंगी कोचिंग अकादमी के, बिना किसी मजबूत नेटवर्क या गॉडफादर के और पूरी तरह से अपने दम पर पढ़ाई करते हुए उन्होंने वर्ष 2005 की यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में शानदार सफलता हासिल की और ऑल इंडिया स्तर पर 20वीं रैंक (AIR 20) प्राप्त की। इस तरह उन्हें महाराष्ट्र का होम कैडर मिला और उनका आईएएस बनने का सपना सच हो गया।

औरंगाबाद से की उच्च शिक्षा, पॉलिटिकल साइंस में मास्टर डिग्री के बाद क्रैक किया यूपीएससी

अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा के सफर के बारे में बात करें तो तुकाराम मुंडे ने वर्ष 1996 में औरंगाबाद (जिसे अब छत्रपति संभाजीनगर के नाम से जाना जाता है) के प्रसिद्ध गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंस से अपनी बैचलर डिग्री पूरी की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1998 में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान (Political Science) विषय में एमए (MA) की मास्टर डिग्री हासिल की। अपनी मास्टर डिग्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पूरी तरह से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी पर अपना ध्यान केंद्रित किया और दिन-रात कड़ी मेहनत करते हुए आखिरकार 2005 में सफलता का परचम लहरा दिया। सिविल सेवा में आने के बाद भी उन्होंने अपनी सीखने की भूख को कभी कम नहीं होने दिया। उन्होंने वित्तीय विश्लेषण (Financial Analysis), राजकोषीय नीति (Fiscal Policy), लीडरशिप, टैक्स एनालिसिस, रेवेन्यू फोरकास्टिंग, मैक्रोइकॉनॉमिक मैनेजमेंट और आपदा प्रबंधन (Disaster Management) जैसे तमाम उच्च स्तरीय और महत्वपूर्ण कोर्स भी सफलतापूर्वक पूरे किए, ताकि वे प्रशासन को और अधिक प्रभावी ढंग से चला सकें।

21 साल की सेवा में 25 बार हुआ ताबड़तोड़ तबादला, फिर भी नहीं डिगा हौसला

तुकाराम मुंडे की कार्यशैली का सबसे बड़ा और अनोखा पहलू यह है कि वे अपनी ईमानदारी और सख्त फैसलों के कारण हमेशा सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय रहे हैं। उनके दो दशक यानी 21 साल के लंबे प्रशासनिक करियर में अब तक कुल 25 बार ट्रांसफर (तबादला) हो चुका है। आम तौर पर देश में किसी भी आईएएस अधिकारी को एक पोस्टिंग पर कम से कम दो से तीन साल का कार्यकाल पूरा करने का मौका मिलता है, लेकिन तुकाराम मुंडे के साथ ऐसा शायद ही कभी हुआ। उन्हें लगभग हर जगह कम समय में ही हटा दिया गया और कई बार तो उन्हें बिना किसी निश्चित पोस्टिंग के भी रखा गया। इसके बावजूद उनके तेवर में कभी कोई नरमी नहीं आई। उनका स्पष्ट मानना है कि उनका हर एक काम पूरी तरह से कानूनी, नैतिक रूप से सही और केवल और केवल जनहित में होना चाहिए। वे दो टूक कहते हैं कि यदि कोई निर्णय इन मानकों पर खरा उतरता है, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट और बिना किसी दबाव के उसे लागू करते हैं, चाहे सामने कितना भी प्रभावशाली व्यक्ति क्यों न खड़ा हो।

जल संरक्षण से लेकर म्युनिसिपल प्रशासन तक मिले कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार

अपनी बेदाग ईमानदारी और जनहितकारी कार्यों के लिए तुकाराम मुंडे को देश और राज्य स्तर पर कई बड़े सम्मानों से नवाजा जा चुका है। जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए क्रांतिकारी कार्यों के कारण उन्हें जनता और मीडिया द्वारा प्यार से 'महाराष्ट्र का वाटरमैन' भी कहा जाता है। इसके अलावा शहरी प्रशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और परिवहन व्यवस्था में नई पहल करने के लिए उन्हें देश भर में पहचान मिली। वर्ष 2015-16 के दौरान जिला प्रशासन में हर मोर्चे पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए उन्हें महाराष्ट्र सरकार की तरफ से प्रतिष्ठित 'बेस्ट कलेक्टर अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया। इसके अलावा केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। जब वे नवी मुंबई के म्युनिसिपल कमिश्नर के रूप में कार्यरत थे, तब उनके द्वारा ई-टॉयलेट और भूकंप-रोधी सुधार की पहलों के लिए उन्हें प्रतिष्ठित 'SKOCH ऑर्डर ऑफ मेरिट' से सम्मानित किया गया। वर्ष 2017 में उन्हें 'बेस्ट इंटीग्रेटेड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम' के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।

नवी मुंबई कार्यकाल के दौरान फिजूलखर्ची पर लगाई रोक, शुरू की 'वॉक विद द कमिश्नर' पहल

तुकाराम मुंडे जब 2016 में नवी मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के कमिश्नर बने थे, तब वहां पहले से ही कई करोड़ रुपये के ऐसे प्रोजेक्ट्स मंजूर हो चुके थे जिनकी उपयोगिता को लेकर गंभीर सवाल थे। इनमें 20 करोड़ रुपये की मार्बल की मूर्ति लगाने का प्रस्ताव और मोरबे डैम पर 163 करोड़ रुपये का सोलर प्रोजेक्ट शामिल था। मुंडे ने इन दोनों प्रोजेक्ट्स को पूरी तरह से अनावश्यक और जनता के पैसों की बर्बादी मानते हुए तुरंत रद्द कर दिया और उस भारी-भरकम फंड का इस्तेमाल शहर के बुनियादी ढांचे को सुधारने और दिव्यांगों के लिए शहर को अधिक सुलभ बनाने में किया। इसके अलावा जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित करने के लिए उनकी 'वॉक विद द कमिश्नर' (Walk with the Commissioner) पहल काफी लोकप्रिय हुई। वे हर रविवार की सुबह शहर की सड़कों पर सैर पर निकलते थे और आम नागरिकों को अपने साथ चलने के लिए आमंत्रित करते थे, ताकि लोग बिना किसी डर या औपचारिकता के सीधे अपनी समस्याएं और सुझाव उन तक पहुंचा सकें। हालांकि, इस पारदर्शी और जनता-मुखी कार्यशैली के कारण कई बार स्थानीय राजनेताओं और पार्षदों के साथ उनका तीखा टकराव भी हुआ, लेकिन एक जननायक के रूप में जनता हमेशा उनके समर्थन में चट्टान की तरह खड़ी नजर आई।