CEC ज्ञानेश कुमार कब होंगे रिटायर और किसके हाथ होगी कमान, देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन का नया नियम और विवाद

CEC ज्ञानेश कुमार कब होंगे रिटायर और किसके हाथ होगी कमान, देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन का नया नियम और विवाद

भारत निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस समय देश के सबसे बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक बहस के केंद्र बिंदु बन गए हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के दौरान लिए गए नीतिगत निर्णयों, मतदाता सूची में तकनीकी परिवर्तनों और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कदमों को लेकर विपक्षी दल लगातार मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। आयोग की कार्यप्रणाली पर यह विवाद उस समय और अधिक गहरा गया जब एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक की विस्तृत खोजी रिपोर्ट में भारतीय निर्वाचन आयोग के भीतर के गंभीर आंतरिक मतभेद खुलकर सार्वजनिक मंच पर आ गए। इस रिपोर्ट में आधिकारिक दस्तावेजों के हवाले से दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों की समयावधि के भीतर कम से कम 14 अलग-अलग अवसरों पर SIR प्रक्रिया, नीतिगत फैसलों और जारी किए गए प्रशासनिक आदेशों पर अपनी औपचारिक असहमति दर्ज कराई थी। इन तीखी आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण की प्रक्रियात्मक जटिलताएं, फॉर्म-6 के प्रारूप में किए गए अहम संशोधन और पूरे देश के मतदाता सूची डेटाबेस का एकतरफा केंद्रीकरण करने जैसे बुनियादी व संवेदनशील मुद्दे शामिल थे, जिसने पूरी चुनावी मशीनरी की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

कौन हैं CEC ज्ञानेश कुमार: IIT, हार्वर्ड से लेकर धारा 370 और राम मंदिर ट्रस्ट तक का सफर

भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के उत्तराखंड कैडर के 1988 बैच के वरिष्ठ अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने फरवरी 2025 में देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर संवैधानिक पदभार ग्रहण किया था। तय संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के अनुसार, उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक निर्धारित है। प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी बेहद प्रभावशाली रही है; उन्होंने देश के शीर्ष तकनीकी संस्थान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने इन्स्टिट्यूट ऑफ चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट्स ऑफ इंडिया (ICFAI) से बिजनेस फाइनेंस का अध्ययन किया तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिष्ठित हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पर्यावरण अर्थशास्त्र में विशेषज्ञता हासिल की। अपने शानदार प्रशासनिक जीवन की शुरुआती अवधि में उन्होंने केरल सरकार के अधीन कई महत्वपूर्ण विभागों में अहम पदों का दायित्व संभाला। केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति के दौरान उन्होंने रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय (MHA) में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव, और बाद में संसदीय कार्य मंत्रालय व सहकारिता मंत्रालय में पूर्ण सचिव के रूप में अपनी सेवाएं दीं। केंद्रीय गृह मंत्रालय में अपने संवेदनशील कार्यकाल के दौरान उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A के विशेष संवैधानिक प्रावधानों को हटाए जाने के बाद उत्पन्न हुई कानूनी व प्रशासनिक चुनौतियों के प्रबंधन में और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के उपरांत श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के विधिवत गठन की समूची रूपरेखा तैयार करने में बेहद केंद्रीय व निर्णायक भूमिका निभाई थी।

ज्ञानेश कुमार के बाद कौन बनेगा देश का अगला मुख्य चुनाव आयुक्त?

ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 26 जनवरी 2029 को समाप्त होने के बाद, निर्वाचन आयोग में वरिष्ठता के स्थापित प्रशासनिक सिद्धांतों के आधार पर वर्तमान चुनाव आयुक्त विवेक जोशी के भारत के 27वें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) बनने की सर्वाधिक प्रबल संभावना मानी जा रही है। विवेक जोशी हरियाणा कैडर के 1989 बैच के एक अत्यंत अनुभवी आईएएस अधिकारी हैं, जिन्होंने केंद्र और राज्य स्तर पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं और निर्वाचन आयोग में अपनी नियुक्ति से पूर्व वे हरियाणा के मुख्य सचिव के रूप में शीर्ष प्रशासनिक पद पर कार्यरत रह चुके हैं। उनकी संभावित पदोन्नति और नियुक्ति भी संसद द्वारा वर्ष 2023 में पारित किए गए नए वैधानिक प्रावधानों, सर्च कमेटी की सिफारिशों और प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली उच्चस्तरीय चयन समिति की औपचारिक मंजूरी के आधार पर ही राष्ट्रपति द्वारा निष्पादित की जाएगी, जिससे आयोग का नेतृत्व अगले दौर के राष्ट्रीय चुनावों के लिए निर्धारित होगा।

कैसे होती है देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति: पूरी वैधानिक प्रक्रिया

संसद द्वारा दिसंबर 2023 में पारित मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम के अंतर्गत अब देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन की एक चरणबद्ध व बहुस्तरीय कानूनी रूपरेखा निर्धारित की गई है। इस नई प्रणाली के प्रथम चरण में केंद्रीय कानून मंत्री की अध्यक्षता में गठित एक विशेष 'सर्च कमेटी' (खोज समिति) सक्रिय होती है, जिसमें भारत सरकार के दो वरिष्ठ सचिव स्तर के अधिकारी बतौर सदस्य शामिल रहते हैं। यह खोज समिति निर्धारित सेवा मानदंडों, वरिष्ठता और प्रशासनिक योग्यता के कड़े मानकों पर विचार-विमर्श करके उपयुक्त उम्मीदवारों में से 5 शीर्ष नामों को शॉर्टलिस्ट कर आगे बढ़ाती है। इसके पश्चात, शॉर्टलिस्ट किए गए इन नामों में से अंतिम नाम का चयन करने के लिए तीन-सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति की निर्णायक बैठक होती है। इस तीन सदस्यीय शक्तिशाली पैनल में स्वयं देश के प्रधानमंत्री (जो समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं), लोकसभा में विपक्ष के आधिकारिक नेता या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता, और प्रधानमंत्री द्वारा विशेष रूप से नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री सदस्य के रूप में शामिल होते हैं। यह उच्चस्तरीय चयन समिति जिस नाम की औपचारिक सिफारिश करती है, उस पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा अंतिम मुहर लगाई जाती है और विधिवत अधिसूचना जारी कर दी जाती है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2023 के इस कानून के अस्तित्व में आने से पूर्व, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत सीधे तौर पर राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सामान्य सलाह पर की जाती थी।

2023 के नए कानून पर सुप्रीम कोर्ट बनाम संसद का टकराव और वर्तमान विवाद

ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के समय से ही इस संशोधित चयन प्रणाली पर देश भर में तीखा राजनीतिक और विधिक संग्राम छिड़ा हुआ है। दरअसल, मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' मामले में एक ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए स्पष्ट निर्देश दिया था कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता और संस्थागत निष्पक्षता की रक्षा के लिए जब तक संसद कोई नया कानून नहीं बनाती, तब तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) अनिवार्य रूप से शामिल रहेंगे। हालांकि, केंद्र सरकार ने दिसंबर 2023 में नया कानून पारित करते हुए इस त्रिस्तरीय पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश को पूरी तरह बाहर कर दिया और उनके स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को पैनल में शामिल कर लिया। इस बदलाव पर विपक्षी दलों का सबसे बड़ा वैधानिक और नैतिक तर्क यह है कि इस नई संरचना के तहत तीन में से दो सदस्य सीधे केंद्र सरकार और सत्ताधारी दल के प्रतिनिधि बन जाते हैं, जिससे समिति के भीतर सत्तापक्ष को स्थायी दो-तिहाई बहुमत हासिल हो जाता है और विपक्ष के नेता की किसी भी असहमति या आपत्ति का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रह जाता। इस संशोधित कानून की संवैधानिक वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाओं के जरिए चुनौती दी गई है, जिस पर सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की खंडपीठ द्वारा एक विभाजित फैसला (स्प्लिट वर्डिक्ट) सुनाए जाने के बाद यह कानूनी लड़ाई अब और भी बड़ी संवैधानिक पीठ के समक्ष विचारणीय बनी हुई है।