बुजुर्गों के अधिकारों और वृद्धाश्रमों की दयनीय स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से मांगी विस्तृत रिपोर्ट

बुजुर्गों के अधिकारों और वृद्धाश्रमों की दयनीय स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से मांगी विस्तृत रिपोर्ट

भारतीय समाज में उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके वरिष्ठ नागरिकों के जीवन को सम्मानजनक, सुरक्षित और बेहतर बनाने की दिशा में देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बहुत ही संवेदनशील, सख्त और ऐतिहासिक कदम उठाया है। भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय बेंच ने देश भर के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वृद्धाश्रमों की वास्तविक स्थिति और वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं और मानवीय अधिकारों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को औपचारिक नोटिस जारी कर यह निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में संचालित हो रहे वृद्धाश्रमों के निर्माण, रख-रखाव, चिकित्सा सुविधाओं और वहां रह रहे बुजुर्गों की जीवन दशाओं पर एक विस्तृत और ताजा स्थिति रिपोर्ट (Status Report) अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। आधुनिक युग में जहां एक तरफ भौतिकवादी संस्कृति तेजी से पैर पसार रही है और संयुक्त परिवार प्रणाली कमजोर होने के कारण बड़ी संख्या में बेसहारा बुजुर्ग अपने ही घरों से तिरस्कृत होकर वृद्धाश्रमों में जीवन बिताने को मजबूर हैं, ऐसे में देश की सबसे बड़ी अदालत का यह कड़ा रुख उन तमाम बुजुर्गों के जीवन में आशा की एक नई किरण लेकर आया है। प्रशासन और सरकारों की सुस्ती को दरकिनार करते हुए न्यायपालिका ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि देश के वरिष्ठ नागरिकों के संवैधानिक और मानवीय अधिकारों की रक्षा करना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

साल 2016 की महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर चल रही है सुनवाई, डॉ. अश्विनी कुमार ने की है पैरवी

इस पूरी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो यह बेहद महत्वपूर्ण मामला पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ वकील डॉ. अश्विनी कुमार द्वारा साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई एक व्यापक जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा हुआ है। पिछले एक दशक से अधिक समय से अदालत में लंबित इस जनहित याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि देश के प्रत्येक जिले में बुजुर्गों के लिए पर्याप्त और आधुनिक सुविधाओं से लैस वृद्धाश्रमों का निर्माण किया जाना चाहिए, उन्हें जीवनयापन के लिए सम्मानजनक पेंशन मिलनी चाहिए और उनके स्वास्थ्य तथा चिकित्सा उपचार के लिए विशेष इंतजाम किए जाने चाहिए। मौजूदा सुनवाई के दौरान, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ ने इस मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को गहराई से समझा है। खुद याचिकाकर्ता डॉ. अश्विनी कुमार ने अदालत में अपनी प्रभावशाली पैरवी के दौरान इस बात को रेखांकित किया कि वृद्धाश्रमों की स्थापना और बेसहारा बुजुर्गों की देखभाल करना केवल कोई प्रशासनिक या कागजी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उनके मौलिक और मानवीय अधिकारों का प्रश्न है, जिस पर राज्य सरकारों को पूरी गंभीरता से काम करना चाहिए।

केंद्र सरकार के सुझाव को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने मांगा राज्यों से सीधा जवाब

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से यह सुझाव दिया गया था कि बुजुर्गों के कल्याण और वृद्धाश्रमों से जुड़े इन स्थानीय मामलों को संबंधित राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) में स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि वहां स्थानीय स्तर पर इनकी निगरानी हो सके। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया और यह उचित समझा कि इस गंभीर विषय पर देश के सभी राज्यों से सीधे तौर पर जमीनी हकीकत का ब्यौरा मांगा जाना चाहिए। अदालत ने अपनी प्रशासनिक शक्ति का उपयोग करते हुए यह निर्देश दिया है कि देश के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी सभी राज्यों के महाधिवक्ताओं (Advocate Generals) को इस संबंध में आधिकारिक संदेश भेजेंगे। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि जैसे ही राज्यों के महाधिवक्ता को यह औपचारिक सूचना प्राप्त होगी, उसके ठीक चार सप्ताह के भीतर सभी राज्य सरकारों को अपनी-अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दाखिल करनी होगी। इस निर्देश के बाद सभी राज्य प्रशासनों में हड़कंप मच गया है क्योंकि उन्हें अब अपने-अपने राज्यों के वृद्धाश्रमों की जमीनी और वास्तविक रिपोर्ट सर्वोच्च अदालत को सौंपनी होगी।

राज्यों को बताना होगा वृद्धाश्रमों की स्थिति, बुनियादी सुविधाएं और बुजुर्गों का हाल

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मांगे गए इस ब्यौरे के दायरे में केवल कागजी आंकड़े शामिल नहीं होंगे, बल्कि राज्यों को स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि उनके भौगोलिक क्षेत्र में कितने वृद्धाश्रम विधिवत संचालित हो रहे हैं, उनमें रहने वाले बुजुर्गों की संख्या कितनी है, और उन्हें वहां कौन-कौन सी बुनियादी सुविधाएं जैसे कि पौष्टिक भोजन, स्वच्छ पेयजल, साफ-सुथरे कमरे, मनोरंजन के साधन और सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराई जा रही हैं। अदालत ने अपने पुराने निर्देशों का हवाला देते हुए इस बात पर भी जोर दिया है कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और 'हेल्पएज इंडिया' जैसी प्रतिष्ठित एवं सामाजिक संस्थाओं की भूमिका इस पूरे तंत्र को पारदर्शी और प्रभावी बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। कई राज्यों में वृद्धाश्रमों की वित्तीय स्थिति बेहद खराब है, वहां पर्याप्त स्टाफ नहीं है और बीमार बुजुर्गों के लिए समय पर दवाइयां और डॉक्टर उपलब्ध नहीं होते हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त मॉनिटरिंग के बाद उम्मीद की जा रही है कि राज्य सरकारें अब इन वृद्धाश्रमों के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए युद्ध स्तर पर कदम उठाएंगी।

भारतीय संस्कृति बनाम आधुनिक वृद्धाश्रम: समाज के बदलते स्वरूप में बुजुर्गों की सुरक्षा का सवाल

यह पूरा मामला केवल कानूनी बहसों या अदालती फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे आधुनिक भारतीय समाज के उस कड़वे सच को भी आईना दिखाता है जहाँ पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच बुजुर्ग माता-पिता अपने ही परिवारों में उपेक्षित हो रहे हैं। एक समय था जब संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों को घर का मुखिया मानकर उनकी सेवा और सम्मान को सबसे बड़ा धर्म माना जाता था, लेकिन आज के दौर में बढ़ती महंगाई, संकुचित होती सोच और पारिवारिक विघटन के कारण बुजुर्गों को वृद्धाश्रमों की चारदीवारी में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसे में, यदि देश के वृद्धाश्रमों में भी उन्हें नारकीय या अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़े, तो यह एक सभ्य समाज के लिए सबसे बड़े कलंक के समान है। सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक हस्तक्षेप इस बात का प्रतीक है कि न्यायपालिका देश के उन तमाम बेसहारा, लाचार और बुजुर्ग नागरिकों की ढाल बनकर खड़ी है जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपनों से ठुकराए जाने का दर्द झेल रहे हैं।

न्यायपालिका की इस सख्त पहल से देश भर के लाखों बुजुर्गों के जीवन में सुधार की जगी उम्मीद

कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस कदम की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए कहा है कि यदि अदालत इसी प्रकार सख्ती से सभी राज्यों से अनुपालन रिपोर्ट लेती रही, तो देश भर के वृद्धाश्रमों की तस्वीर में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है। कई राज्यों में कागजों पर वृद्धाश्रम चल रहे हैं लेकिन धरातल पर वहां बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है। चार सप्ताह के भीतर आने वाली इन रिपोर्टों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट भविष्य में कुछ कड़े राष्ट्रीय मानक (National Standards) तय कर सकता है, जिनका पालन करना सभी राज्यों के लिए अनिवार्य होगा। वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्थाओं को पूरी उम्मीद है कि इस न्यायिक पहल के परिणामस्वरूप न केवल वृद्धाश्रमों की भौतिक दशा सुधरेगी, बल्कि देश के हर कोने में बुजुर्गों को वह गरिमा, सम्मान और सुरक्षा मिलेगी जिसके वे अपने पूरे जीवनभर देश और परिवार को सींचने के बाद वास्तव में हकदार हैं।